Wednesday, 30 December 2020

ख़ामोशी

कहीं दूर मिलूँगा फिर तुमको,
वो जज़ीरा जहाँ मैं हूँ,
जहाँ तुम हो,
और ख़ामोशी हो।

कहीं दूर मिलूँगा फ़िर तुमको,
वो जज़ीरा जहाँ लव्ज़ हों बुझे-बुझे,
सागर से हारे हुए,
वो सागर जो सब सुन रहा हो, समझ रहा हो,
वो लफ़्ज़ों का सागर ख़ामोश हो, बेहिस हो।

कहीं दूर मिलूँगा तुमको,
जब सब धुल गया हो,
ये चाँदनी, ये नूर,
ये गुल, वो गुलज़ार,
जब सब सिमट चुका हो,
झुलस चुका हो।

उस आग में,
उस दाग में,
ना फ़िराक़ में,
ना फ़रियाद में,
बस एक याद में,
फ़िर मिलूँगा तुमको,
कहीं दूर फ़िर मिलूँगा तुमको।

एक रोज़ जब कभी कट रही होंगी उफ़ूक़ की नज़र,
टूटने लगा हो जो खामोशी का असर,
शायद यही होगा फुरक़त का असर,
उस जज़ीरे से जहाँ पर मैं था,
तुम थी,
ख़ामोशी थी कभी।

अब लव्ज़ हैं तो शोर है,
कुछ इस ओर कुछ उस छोर है,
बेताबी झुलस रही है इधर भी, उधर भी,
बेख़याली सिसक रही है इधर भी, उधर भी।

ये सागर जो पुकार रहा है,
उस पाक जज़ीरे को ललकार रहा है,
इसकी लहरों में ना आना,
मुझे कहीं भूल ना जाना।

भूल गई तो याद दिलाता हूँ,
मैं फ़िर बीती बात सुनाता हूँ,
जब कुछ कहने को नही था,
जब कुछ सुनने को नही था।

उस जज़ीरे पर,
जहाँ मैं था
जहाँ तुम थी,
और ख़ामोशी थी।


Wednesday, 18 November 2020

दीद-ए-दिल से यार के मुझको भला पाना क्या है?

दीद-ए-दिल से यार के मुझको भला पाना क्या है?
हर्फ़-तहरिरों के फ़न से मुझको दिखलाना क्या है?

हो कसक स्याही में पुख़्ता, हो तड़प दिल-ए-यतीम,
आबाद तुझको करके दुनिया को बसाना क्या है?

आ सका हो कोई साक़ी दर पे तेरे ऐ सनम,
गर पाया हो पा ख़ुल्द में तो फिर साक़ी को झुटलाना क्या है।

हम जानते हैं तेरे जलवों की हक़ीक़त, मगर ऐ महजबीं,
हो रही हैं बे-नूर रातें कुछ दिनों से, बता इरादा क्या है?

है ले रही ताउम्र तेरी वस्ल की वो एक दफ़ा,
जो इंतेक़ाम-ए-वक़्त में ना हो फ़ना वो दीवाना क्या है?

जो लिया तेरी मोहब्बत का जोग, मैं बे-इख़्तियार,
अब होश संभालूँगा तो पूछूँगा, बेख़ुदी क्या है?

बेख़ुदी में बे-हिसि सी आ रही है आजकल,
आया जो गली-ए-रक़ीब, पूछा तेरा पता क्या है?

जा जनेमन, बांधे कफ़न, मैं जा रहा हूँ लौट के,
तेरा पता तो मिल गया, मेरा बता क्या है?

हो मुबारक एक सफ़ीना ऐ हसीना, ग़ैर का,
काग़ज़ी कश्ती मेरी साहिल को ताकती क्या है?










Monday, 2 November 2020

वो शहर

बेसब्र आँखें, ये बेक़ब्र जिस्म,
ये आह-ओ-फुगाँ भरते मुफ़लिस,
मंज़र लेते खर्राटे हैं,
अब चारों ओर सन्नाटे हैं।

ता-निगाह तेज़ाब फ़ैला है हुआ एक कहर का,
ख़ून के पैराब से रस्ता मिला है सहर का,
एक नए शहर का...

ये शहर बड़ा अंजान है,
नाम है, पर बदनाम है,
गुमनाम है।

ये शहर जो कभी बस्ता था,
जहाँ बच्चा-बच्चा हँसता था,
आज खामोश है,
खानाबदोश है।

गुलज़ार तो है, गुलफ़ाम नहीं,
बंजर ना हो, कोई बाग़ नहीं।
हाँ खेत झुलसते थे पहले,
पर उनमें अब वो बात नहीं।

अब ना किसी का पहरा होगा,
ये सराय भी सेहरा होगा।
जलता है दिन जलता होगा,
ढ़लता है दिन ढ़लता होगा,
अंधियारा घनेहरा होगा।

Saturday, 22 August 2020

Crimson Dream

Afloat on a lucid sky,
A waywardly wavely flag astride,
Grappling with the present's gleem,
A crimson dream.

The flag is no flag but a diary,
Of words and verses ordinary.
An ode to someone, somewhere,
Like the breath of spring air.

The air, her air, is such a flight,
The flag which flew with all its might.
Has flown back to me,
Has boomeranged to reality.

I've felt such exaltation,
I've felt such jubilation,
But never have I ever,
Felt this levitation.

L'armour sans armour is a tough tragedy,
As you collect the spoils of your heart's treachery.
Lord! Grace this frail friend of mine,
Sooth the heart which has mangled the affairs of the mind.

Five years, five phases of consternation,
Disbelief, surrealism and artistic frustration.
For I've seen five faces and all resemble too.
I've had a crimson dream, what about you?

Wednesday, 20 May 2020

कौन इश्क़ करेगा?

वादे वफ़ा के ज़ुल्म-ओ-सितम से भरी,
इस शब से कौन ज़ीस्त भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

दो दिल बन गए हैं हाथ की सफ़ाई,
सफ़ाई से सौदा, सौदे में सौदाई,
या हरजाई कौन बनेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

आये दिन रश्क़ होते हैं, रंज होते हैं,
आशिक़ों की आशिक़ी पर तंज़ होते हैं।
इन कहे-सुने अफ़सानों पर ऐतबार कौन करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

मेरी महबूबा, मोहहब्बत कोई बुत नहीं,
सूरत नही, सीरत सही,
जिस्मानी ज़माना क्या समझेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

चार पल फुरसत के यहाँ मिलते उधारी हैं,
लब साज़-ओ-आवाज़ के भिखारी हैं।
दो लफ्ज़ कहने की नवाज़िश कौन करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

दिल के दर-ओ-दीवार का दीदार आसान है,
चंद टुकड़े शीशे के यहाँ मेहमान हैं।
इस टूटे आशियाने का कर्ज कौन भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

इश्क़ मैखाना नहीं, मधुशाला नहीं,
इश्क़ ईमान है, एहसान नहीं,
है एहसानफरामोश ये ज़माना, मेरी उल्फ़त का क्या करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

नज़र से पी लो यह पैमाने, 
इल्म नहीं इन्हें सादगी क्या जानें?
प्यार सादगी है, बन्दगी है,
इन ख़यालों पर कहाँ कोई मरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

मैं नहीं कहता फ़ना हो जाओ,
बेबस, बेकल, ताबाह हो जाओ।
सवाल यह है के जाम-ए-मोहब्बत का पहला कश कौन भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?

Monday, 4 May 2020

चल यारा, एक पैग बनाए!

गम-ए-हयात, अरे हयात ही भूल जायें,
चल यारा, एक पैग बनाएँ!
पियें देसो या रूसी,
पर फ़िर पहचान में ना आयें।

सुना कल मंडी खुल रही है,
बड़ी तलब हो रही है।
कारोबार का कारवाँ बनाकर,
क्यों ना सस्ते साक़ी बन जायें?

आज उड़ाओ तमाम पैसे,
ठेका देसी शराब पर।
क्या पता कल इनकी खरीदारी पर,
रोक हो जाये, अरे खत्म ना मेरा 'स्टोक' हो जाये!

तू आगे चल मैं पीछे आता हूँ,
बगल वाले शाणे को बताता हूँ।
नशे में वो इतना धुत ना हो जाए,
के मेरे बाप को ही भूल जाए!

क़तार बनाओ या बनाओ हुजूम,
दिखता है, बिकता है जुनून।
एक ग्लासी, दो ग्लासी तीन चार हो जाए,
कदम उछलने दे, चल टल्ली हो जायें।

भुला नही सकता मैं वो मज़दूर राही,
साक़ी ला सुराही! ला सुराही! 
मुझे पीना है के भूल जाऊं,
कल का साया फिर नज़र ना आये।

चल ग़ज़ल और लीचढ़ गीत दोनों एक साथ गायें,
यारा तूने इतने पैग बनाये,
के ना तो अब हिंदी नसीब,
ना तो अंग्रेज़ी समझ आये।

घर चल भाई, उतारनी है,
मेरी तो आदत पुरानी है,
तू भी ना शराबी हो जाये,
अपने घरवालों को सताए!

रहने को घर नही है!
सोने को बिस्तर नही! 
एक गाना और हो जाये,
वो देख! बोतलें आ गईं! आये हाय!

वो देखो, शराब भी है शबाब भी,
क़तार में खड़ी है मेरी दिलरुबा भी।
चुप बे! मैखाना लिंग में भेद नही करता,
इक्कीस-पच्चीस पार, निषेद नही करता!

है भगवान कैसे दोस्त हैं पाए,
लड़का पिये तो मर्द है! लड़की पिये तो हाय-हाय?!

अच्छा दोस्त, माफ़ी देदे,
एक बाटली तो देदे,
कहीँ ऐसा ना हो हम यूँ ही बतियाते जाएं,
क़तार में सवेरे से खड़े हैं प्यासे, प्यासी ना ये शाम कट जाए।

Tuesday, 14 April 2020

संविधान और मेरा दिल

सावरकर कहते हैं वो मुझको,
पर दिल तो वामपंथी है।
ना जाने फ़िर कहाँ से आई,
ऐसी कट्टरपंती है?

वो कट्टरपंती जो कभी किसी को,
छोटा बड़ा ना तोलती हो।
वो कट्टरपंती जो सभी मसलों को,
एक नाप में तोलती हो।

वो कट्टरपंती जो संविधान को,
पूजती और सरहाती है,
निरपेक्षता के विवाद पे उसकी,
गाड़ी फ़िर थम जाती है।

दिल दहलता है ऊंच नीच की राहों से,
धर्मों को ढाल बनाने से।
कवि की हैसियत से कहता हूँ,
डर लगता है फ़िर ज़माने से।

फिर पन्ने पलटे कानूनी,
जानने थे कुछ राज़ ज़रूरी।
एक नज़र में जान गए,
उस बे-दिल को पहचान गए।

कवि थे, रो दिए,
दो घड़ी राजनीति को छोड़ दिए।
कवि थे ना! नादान थे,
इसकी क़लम से अनजान थे।

वो कलम जिसने कल लिखा,
कल को परसों बनाती है,
हाँ, हाँ ये मोटी किताब,
मेरा देश चलाती है।

चले आए कविकरन,
देश बदलने, बनाने।
दिल की धड़कन और उल्फ़त में,
बन गए रोज़ फसाने।

भुकमरी ओर गरीबी से,
धनवानों की जागीरों से,
वो दिल कितना रोता जो जुड़ा है,
लाखों की ताक़दीरों से।

ये संविधान इश्क़ से नही,
मस्तिष्क से बना है।
इसकी स्याही में,
पूरा न्यायालय सना है।

ये बे-दिल है, बे-हिस नही,
हम ख़फ़ा ज़रूर हों, बेबस नहीं।
शुक्र है सिर्फ दिमाग है इसका,
दिल पे तो किसी का बस नही।

Sunday, 12 April 2020

आधा

आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे,
वो आधी आधी नींद में काटी,
आधी आधी रातें।

सादा मेरा इश्क़ मगर वो आधा आधा लगता है,
खत लिखता हूँ महबूबा को, चेहरा आधा दिखता है।
कब जाने सर चढ़ गईं, घर कर गईं फज़ूल की बातें,
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

वो ख़्वाब भी क्या ख़्वाब है जो दोबारा ना बिक सके,
वो आधा ही सादा है, जो पूरा सा दिख सके।
सुर्खियों को पढ़कर याद आती हैं हर्फ़ की आहें,
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

तस्करी निभाते निभाते कहाँ पहुँच चुका हूँ,
मैं अपने ही जिस्म-ओ-आवाज़ में आधा बंट चुका हूँ।
आधे मेरे जलवे हैं, आधे मेरे इरादे।
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

फ़ुरसत मिले तो इस किरदार से इश्क़ फ़ॉर्मना,
मालूम है मुझे, ज़ालिम है ज़माना।

अमावस सनी है हवस की आहों से,
पुरनूर रातें सजी हैं फ़रेबी सितारों से।
चले आओ के चाँद आधा है,
करनी है कुछ बातें।
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

Monday, 6 April 2020

सपना

ये मन वंछित सा रहता है,
क्या सोच रहा है क्या जाने,
सपने आते हैं रोज़ मगर,
हर रात क्यों लगते अनजाने?

कई ख़्वाबों की गठरी है,
जैसे रेल की पटरी है।
निसदिन गाड़ी रास्ता देखे,
नई बोगी है, वो क्या जाने।

के एक रात कहाँ हम ठहरे हैं,
कई दर-ओ-दीवार पर पहरे हैं,
इधर उधर से उधारी हैं पल दो पल की यादें,
ये सौदाई बंजारा क्या जाने।

क्या जाने दुनिया दारी को,
दीन-ओ-सियासत की रंगदारी को।
जननी बुत परस्ती करती,
वो बुत क्या है, क्या जाने।

सब आधा अधूरा देखा है,
कोई ख्वाब ना पूरा देखा है।
वो डगर डगर और नगर नगर,
भटका है, रास्ता क्या जाने।

सपने में देखा है उसने,
शायद ना पहचाना उसने।
ये सच है के है ये माया,
करवट का व्यापारी क्या जाने।

इन अशारों में,
चंद इशारों में,
ये रात बहती है क़तरा क़तरा,
सावन का दीवाना क्या जाने।

चलता जाता है, छलता जाता है,
रात का मंजर खलता जाता है।
कच्ची नींद से आँख खुली तो है,
पर होश कहाँ है, क्या जाने।

अब होश कहाँ, मदहोशी है,
बस हलचल है बेहोशी है।
कभी लड़ता है, कभी डरता है, 
सम क्या है, वो क्या जाने।

ख़्वाबों का गुलाबी दर्पण देखकर,
वो अपनी शराबी निगाहें टेक कर।
उस नाज़नीन को देखने के ढूंढता है बहाने,
लहज़ा क्या है, क्या जाने! 

कभी तो ऐनक लगाकर,
वो हाथ से हाथ मिलाकर।
चला है सरकार सजाने,
तज़ुर्बा क्या है, क्या जाने।

कभी बरसती है मीठी बर्फ़,
वो लिखता है यारी दोस्ती के हर्फ़।
चला है पराये को आजमाने,
अपना कौन है, क्या जाने।

सोचता है, खोजता है, हकलाता है,
अपनी हालातों को झुठलाता है।
अश्कों से सना हुआ है तकिया, 
ये ख़्वाब क्या हैं, बस वो जाने...














Saturday, 28 March 2020

गुब्बारे और गुलछर्रे

जवान इरादे नेक नहीँ होते,
सभी कंवारे दिलफेंक नहीँ होते।
आसमानी लगते तो हैं, मगर,
गुब्बारे और गुलछर्रे एक नही होते।

रँगीले, सजीले गुब्बारे में था,
दरकारी फ़नों के सहारे से था,
खींच ले आए हवाओं के मतवाले झोंके,
सूरज बेबस, बे-तेज, ना आसमान रोके।

नीलगगन में छायी थी होली,
एक रंगीन चिड़िया आयी और बोली।
गलचहारों को धूँड, लगा ना गोतें,
ये गोल ग़ुब्बारे किसी के सगे ना होते।

ग़ुब्बारे में मैं था, चंचल सी वो थी,
पहर दो पहर जो अगर बात होती,
तो हमदम हम एक दिन, एक साथ होते,
मगर मनचलों को क्या हालात रोके?

मैं उड़ता रहा, चला फिर परदेस,
वही थी वो वादी, बस बदला था भेस।
ग़ुब्बारे आते, ग़ुब्बारे जाते, पर टूटे दिल के अरमान रोते,
वो चंचल सुनहरे से पंख अब ना उड़ते।

भूले उसे,  भुला ना सका,
मैं उसको दोबारा बुला ना सका।
दिल की जगह काश वक़्त के काँटे होते,
नशतर से उनके टुकड़े-टुकड़े होते।

तराश लाता लमहों को पर बहक सा गया,
मैं फिर किसी इत्र से महक सा गया।
गर उस दिन होश सम्भाले होते,
तो आज हम घोंसले में पधारे होते।

गुलों में रंग भरे थे, रंगों में जाम,
ग़ुब्बारों के समंदर से सजी हुई थी असमानी शाम।
उस शाम गर हाथ पैमाने होते,
तो फिर मैखाने नीलाम होगाए होते।

दिखा फिर एक हसीन ग़ुब्बारा,
पूछा कितने का था हिसाब सारा।
वो सौदा पूरा किया, काश ना करते,
अपनी नज़रों में दलाल तो ना बनते।

दूर कहीं वो डाली रो रही होगी,
उस चिड़िया के आँसुओं को पिरो रही होगी।
पर हम इतने समझदार कहाँ होते,
बेवक़ूफ़ हो गए बहती नदी में हाथ धोते-धोते।

माँ ने रोका, बाप ने टोका,
ग़ुब्बारा मैं, खा गया धोखा।
काश सेहरा ही रहती ज़िंदगी, सराब ना होते,
उम्र के जलवों में हम यूँ ख़राब ना होते।

लौट के कैसे आते, धड़कने बुलंद गा रहीं थी,
चले गए उसी दिशा में जहाँ से सुगंध आ रही थी।
काम से कम बहन का कहा तो मान गए होते,
ग़ुब्बारों के तौर-तरीक़े पहचान गए होते।

ग़ुब्बारों में ग़ुब्बारा, मैं बाग़ी बेचारा,
उड़ता रहा मायावी आसमान में बंजारा।
चाहत थी चिड़िया की, हाथ आए तोते,
ऐ काश मैंने चश्में लगाए होते।

और ग़ुब्बारों को देखा मैंने, कैसे बेख़ौफ़ उड़ते थे,
शायद उनके दरमियाँ हवा के कारतूस हुआ करते थे।
चले आए स्वदेस, कितने ही दिन रोते,
ग़ुब्बारे ख़्वाब जैसे छूट गए, हम रह गए सोते।

मतवाली घाटा ने आवारा बना दिया,
गुलछर्रों की हवस ने ग़ुब्बारा बना दिया।
चले आए पहले सनम के दर ख़ाली हाथ (क्या ये लिहाज़ होते?!)
ख़ाली हाथ आए थे, ख़ाली हाथ लौटे।






















Sunday, 16 February 2020

कच्छप

क़दम देख के चलना,
अतीत को ले के चलते हो।
पैदा हुआ नहीं है जो उसको,
तुम यतीम कर के चलते हो।

ये भंग तुम्हारी है,
ये जंग तुम्हारी है।
इन ख़ून से सनी हवाओं में,
किसके क़श भरते हो?

क़दम देख के चलना,
तुम्हारा कल तुम्हारे कल की पहचान है।
इस प्रतिघात की कसौटी पर,
जुर्म-ओ-ज़ुल्म के मुखौटे पर,
कितना ख़रा उतरते हो?
तुम क्या दुनिया से डरते हो!

यूँ की हम सब जान रहे हैं,
सूची-सामग्री बाँध रहे हैं।
क्या लेके आए थे हम?
क्या ख़ाक लेकर तुम जाते हो?

भाषा पे मत जाना मेरी,
तहज़ीब ना सिखलाना ये भी,
मेरा अपना अन्दाज़ है,
तुम कहाँ की लाते हो?

साये से डर लगने लगा है,
एक अनजान ख़ौफ़ घर करने लगा है।
के हम साथ हैं पर साथ नहीं,
क्या पता तुम कोई चाणक्य-धारी हो?

जान बड़ी या माल बड़ा है,
उससे बड़ा एक सवाल खड़ा है,
जिस ख़ून के जन्मे हो तुम?
लानत है! क्या उसी की दलाली हो?
अरे, मौत की क़व्वाली हो?!

मौत के कुछ पलछिन बाद ये भी हो सकता है,
क़ू-ब-क़ू, हू-ब-हू हो सकता है।
तेरा कल तुझे बुलाता हो,
तेरे आज को मिटाने को।










Wednesday, 12 February 2020

आख़री नज़्म

ये आख़री नज़्म है मेरी,
मोहब्बत के नाम,
शब-ए-वस्ल का यूँ हुआ है अंजाम।

के अब बहिस हैं, पर बेताब हैं,
ये जो जले-बुझे चिराग़ हैं,
उनसे गुज़ारिश है मेरी,
ना भेजें ये पेचीदा पैग़ाम,
ना तोड़ें ख़वाबग़ाह के उस चंचल गुलशन के गुल्फ़ाम।

गर ना थी क़ाबिल-ए-मोहब्बत ये क़िस्मत मेरी,
तो क्यूँ हूँ हैरान?
क्यूँ हूँ परेशान?

के ये मेरा अन्दाज़ नहीं,
मोहब्बत है, किसी के मोहताज नहीं,
आज नहीं तो कल तिजारत हो जाएगा इसका नाम,
लो देता हूँ मैं फ़रमान।

थी दिलचस्प कहानी ये मेरी,
था बेवफ़ा जिसका नाम,
ना था कोई वो इंसान।

के ना तो इंकार था, ना ही इकरार था।
मैं यूँ ही फिरता, बेज़ार था।
कर लूँ ज़रा आराम,
के दिल में अब भी सुलगती है तमन्ना, मचलते हैं अरमान।

भूल तो सब कुछ जाऊँ, पर यादाश्त है मेरी,
तेरे कूँचों में फ़ना,
मेरी रेत के क़तरे सी आना।

वो दिन नहीं भूलता के तुझसे मिला था,
मैं थोड़े क़दम डगमगाए चला था।
के शायद तू लेगी मुझे थाम,
फिर होने लगा मुझे ग़ुमाँ।

के कहीं ये मोहब्बत तो नहीं,
मेरी बचकानी निगाहें देती थी सलाम,
मेरे दिल की धड़कनें - पूर्ण विराम।

तुम भी हँसी, मैं भी हँसा,
मैं हँसा, और फँसा।
उस चेहरे की गहरीयों में,
उन आँखों की पर्चीयों में।

वो ज़ुल्फ़ जो थी घटा ही घटा,
वो चेहरा, पुरनूर सजा।
जो भुला देता था मेरी शायरी का लह्ज़ा,
मेरा प्यार ऐसा, ना हुआ हो कभी जैसा।

वो कहीं हैं, वो यहीं है,
मैं यहाँ हूँ, एक अंकही है,
जो है दरमियाँ।
उफ़्फ़, प्यार की आँधियाँ।

बेहतर हैं ख़ुद सिमट जाएँ,
ये दिल की कश्ती तर जाए।
इसको एक साहिल चाहिए,
एक आशिक़, जाहिल चाहिए।

आज दिल की सुन ली, अब नहि सुनूँगा,
क़सम मोहब्बत की, फिर नहीं लिखूँगा।
क्यूँकि वो महज़ ग़ज़ल नहीं, मेरे दिल की साज़-ओ-आवाज़ है; आबाद है,
वो मेरी है, पर आज़ाद है!

ये आख़री नज़्म है मेरी, मोहब्बत के नाम।







Monday, 10 February 2020

कल की तस्वीर

कल की तस्वीर से आज को सजाता क्या है?
ऐ मेरे दिल, तू उसी को बुलाता क्या है?

जो कल बिछी बिसात थी,
एक अनकही सी बात की।
तू उस बात को उलझाता क्या है?
उलझ कर खुद को समझाता क्या है?

आएगी वो फ़िर, होगी मुलाक़ात,
करेगा तू ताउम्र फ़रियाद।
इतना वक़्त लगता क्या है?
तू अपने दिल को बताता क्या है?

एक मेरा हिस्सा, एक उसका हिस्सा,
अजब है तेरा ये किस्सा।
थोड़ा है तो थोड़े को चाहता क्या है?
बुझी शम्मा को जलता क्या है?

शम्मा नही तेरा दिल है,
टूटे ख्वाबों का जो बिल है।
उसमे घर बसाता क्या है?
यूँ खुदी को फँसता क्या है?

चली गयी है वो, शायद रेल की तरह,
तेरी मोहब्बत थी खेल की तरह।
अब खिलोने माँगाता क्या है?
किसीको रुझाता क्या है?

रोज़ होते हैं तंज़,
बहुत हो गया रंज।
कविकरन! है मोहब्बत तो छुपाता क्या है?
ये शायरी रोज़ सुनाता क्या है?




Saturday, 18 January 2020

मेरे दोस्त

मेरे कई दोस्त हैं,
कुछ टेढ़े, कुछ मेढ़े।
कुछ तीखे, कुछ सूखे।
कोई आगे, कोई पीछे।
कोई ऊपर, कोई नीचे।

ऐसे मेरे दोस्त नहीं,
जो किसी एक लव्ज़ के लायक़ हों।
चाहे वो साजन हो,
या के खलनायक हो।

ऐसी उनकी छवि नहीं,
जो एक ही भाव की रहबर हो,
कोई दोस्त हो कोमल सा,
कोई वीरता का चिह्न हो।

लगते मुझे सभी हैं प्यारे,
राज-दुलारे, अटूट सहारे।

अलग-अलग हैं धर्म सभी के,
अलग-अलग मज़हब हैं।
अलग-अलग भगवान हैं सबके,
हम तो भैय्या "सेकूलर" हैं!

कुछ नौटंकी बच्चे हैं,
कुछ हँसते-गाते हैं।
कुछ अपनी धुन में खोकर,
नयी धुन बनाते हैं।

मेरे दोस्त ज़्यादा नहीं,
बस सात ही हैं।
मामा-पापा तो हैं ही,
ख़ुशी और ग़म को भी दोस्त बना लिया है।

जब सबका साथ हो, और मित्रता की बात हो,
तो क्यों ना बने सारे के सारे दोस्त!
गर सुर और सरगम साथ हो,
तो संगीत ही हुआ वास्तव में मेरा दोस्त!


















Thursday, 9 January 2020

मेरी नज़्में

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,
के ये नग़मा तो आपने सुना ही होगा।
पर मन में एक सवाल भी आता है,
क्या आपने मेरी नज़्मों को कभी ग़ौर से पढ़ा होगा?

कुछ हँसते गाते अल्फ़ाज़ हैं, धूप-ओ-नूर है,
कहीं ग़म का काला रूप है,
लिखता है मेरा कलम जो चाहे,
इसमे मेरा क्या क़सूर है?

हाँ, कभी हो जाता हूँ मैं निबंधि,
कर लेता हूँ कुछ एक शर्मसार तुकबंदी।
पता सबको होता है,
ख़ता अनजाने नही होती है।

कई बार मेरी नज़्में पढ़कर लोग ज़रा नाराज़ हो जाते हैं।
पढ़ते तो हँसी-खुशी हैं,
कुछ देर बाद मिज़ाज से नासाज़ हो जाते हैं।

हाँ, ग़म-ए-हस्ती भी आते हैं,
मौजों की तराह फिर जाते हैं।
मेरी स्याही तो उन थोड़े से अश्कों की रहबर है,
जो पलकों से काग़ज़ पर यूँ ही छलक जाते हैं।

ग़मो की बात हो, तो इश्क़ कैसे पीछे हट जाए,
एक हम हैं, जिनकी पतंग उड़ते ही कट जाए।
"कविकरन" डर मोहब्बत से, कहीं फ़िर गुमान ना होजाये,
दर्द-ए-मोहब्बत के चलते, तेरी नज़्मों से तेरे टूटे दिल की तख़्ती,
और नुमाया ना हो जाए।

पर क्या मेरे अंधे दर्शक हैं?
जो एक शब्द पर नगमस्तक हैं?
क्या उन्हें ये इल्म है,
के ये कविता किसका चिह्न है?

मेरी सबसे एक ही दरख़्वास्त है,
सराहो वही जो आपको लगता ख़ास है,
मेरा क्या, मैं एक तरफ़ा आशिक़, मेरे दो लव्ज़ ही सच हैं,
बाक़ी सब बकवास है।




Monday, 6 January 2020

ये क्या हो रहा है?


रफ़्ता-रफ़्ता जली है लौ,
नुमाइश की अंज़ूमन में।
आनन-फ़ानन ये क्या हो रहा है,
सियासत की चिलमन में।

ग़म इसका नहीं कि कुछ हो रहा है,
कुछ होता तो कुछ और भी होना लाज़मी था,
होते होते यूँ पहुँचा है अंजाम,
आज आह--तड़प निकलती है, तमाम बदन से।

गिला है के मौजूदा शाह-सवार अब तक ख़ामोश हैं,
गिला है के मुल्क में छाई बेचैनी और बेबसी की आग़ोश है।
गिला है के आज सभी अपनी मालूमात, ख़यालात में बेहोश हैं,
के आक्रोश है आज ज़हन--आवाम में।

कल तक जो यहीं के थे,
आज वो क़ौमी बन गए हैं।
शायरों के आशारों में भी,
मज़हबी पन्ने जुड़ गए हैं।
क्या इतनी मग़रूर है मेरी क़लम निगाह--सियासत में?

ना मैं इस दल का हूँ, 
ना उस पंथ का।
ना मैं इस ख़याल का हूँ,
ना उस विचार का।
फिरदौस धूँदता था कभी, अब शाँती चाहता हूँ मैं अहल--वतन से।