Monday, 4 May 2020

चल यारा, एक पैग बनाए!

गम-ए-हयात, अरे हयात ही भूल जायें,
चल यारा, एक पैग बनाएँ!
पियें देसो या रूसी,
पर फ़िर पहचान में ना आयें।

सुना कल मंडी खुल रही है,
बड़ी तलब हो रही है।
कारोबार का कारवाँ बनाकर,
क्यों ना सस्ते साक़ी बन जायें?

आज उड़ाओ तमाम पैसे,
ठेका देसी शराब पर।
क्या पता कल इनकी खरीदारी पर,
रोक हो जाये, अरे खत्म ना मेरा 'स्टोक' हो जाये!

तू आगे चल मैं पीछे आता हूँ,
बगल वाले शाणे को बताता हूँ।
नशे में वो इतना धुत ना हो जाए,
के मेरे बाप को ही भूल जाए!

क़तार बनाओ या बनाओ हुजूम,
दिखता है, बिकता है जुनून।
एक ग्लासी, दो ग्लासी तीन चार हो जाए,
कदम उछलने दे, चल टल्ली हो जायें।

भुला नही सकता मैं वो मज़दूर राही,
साक़ी ला सुराही! ला सुराही! 
मुझे पीना है के भूल जाऊं,
कल का साया फिर नज़र ना आये।

चल ग़ज़ल और लीचढ़ गीत दोनों एक साथ गायें,
यारा तूने इतने पैग बनाये,
के ना तो अब हिंदी नसीब,
ना तो अंग्रेज़ी समझ आये।

घर चल भाई, उतारनी है,
मेरी तो आदत पुरानी है,
तू भी ना शराबी हो जाये,
अपने घरवालों को सताए!

रहने को घर नही है!
सोने को बिस्तर नही! 
एक गाना और हो जाये,
वो देख! बोतलें आ गईं! आये हाय!

वो देखो, शराब भी है शबाब भी,
क़तार में खड़ी है मेरी दिलरुबा भी।
चुप बे! मैखाना लिंग में भेद नही करता,
इक्कीस-पच्चीस पार, निषेद नही करता!

है भगवान कैसे दोस्त हैं पाए,
लड़का पिये तो मर्द है! लड़की पिये तो हाय-हाय?!

अच्छा दोस्त, माफ़ी देदे,
एक बाटली तो देदे,
कहीँ ऐसा ना हो हम यूँ ही बतियाते जाएं,
क़तार में सवेरे से खड़े हैं प्यासे, प्यासी ना ये शाम कट जाए।

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