इस शब से कौन ज़ीस्त भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
दो दिल बन गए हैं हाथ की सफ़ाई,
सफ़ाई से सौदा, सौदे में सौदाई,
या हरजाई कौन बनेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
आये दिन रश्क़ होते हैं, रंज होते हैं,
आशिक़ों की आशिक़ी पर तंज़ होते हैं।
इन कहे-सुने अफ़सानों पर ऐतबार कौन करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
मेरी महबूबा, मोहहब्बत कोई बुत नहीं,
सूरत नही, सीरत सही,
जिस्मानी ज़माना क्या समझेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
चार पल फुरसत के यहाँ मिलते उधारी हैं,
लब साज़-ओ-आवाज़ के भिखारी हैं।
दो लफ्ज़ कहने की नवाज़िश कौन करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
दिल के दर-ओ-दीवार का दीदार आसान है,
चंद टुकड़े शीशे के यहाँ मेहमान हैं।
इस टूटे आशियाने का कर्ज कौन भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
इश्क़ मैखाना नहीं, मधुशाला नहीं,
इश्क़ ईमान है, एहसान नहीं,
है एहसानफरामोश ये ज़माना, मेरी उल्फ़त का क्या करेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
नज़र से पी लो यह पैमाने,
इल्म नहीं इन्हें सादगी क्या जानें?
प्यार सादगी है, बन्दगी है,
इन ख़यालों पर कहाँ कोई मरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
मैं नहीं कहता फ़ना हो जाओ,
बेबस, बेकल, ताबाह हो जाओ।
सवाल यह है के जाम-ए-मोहब्बत का पहला कश कौन भरेगा?
कौन इश्क़ करेगा? कौन इश्क़ करेगा?
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