ये आख़री नज़्म है मेरी,
मोहब्बत के नाम,
शब-ए-वस्ल का यूँ हुआ है अंजाम।
के अब बहिस हैं, पर बेताब हैं,
ये जो जले-बुझे चिराग़ हैं,
उनसे गुज़ारिश है मेरी,
ना भेजें ये पेचीदा पैग़ाम,
ना तोड़ें ख़वाबग़ाह के उस चंचल गुलशन के गुल्फ़ाम।
गर ना थी क़ाबिल-ए-मोहब्बत ये क़िस्मत मेरी,
तो क्यूँ हूँ हैरान?
क्यूँ हूँ परेशान?
के ये मेरा अन्दाज़ नहीं,
मोहब्बत है, किसी के मोहताज नहीं,
आज नहीं तो कल तिजारत हो जाएगा इसका नाम,
लो देता हूँ मैं फ़रमान।
थी दिलचस्प कहानी ये मेरी,
था बेवफ़ा जिसका नाम,
ना था कोई वो इंसान।
के ना तो इंकार था, ना ही इकरार था।
मैं यूँ ही फिरता, बेज़ार था।
कर लूँ ज़रा आराम,
के दिल में अब भी सुलगती है तमन्ना, मचलते हैं अरमान।
भूल तो सब कुछ जाऊँ, पर यादाश्त है मेरी,
तेरे कूँचों में फ़ना,
मेरी रेत के क़तरे सी आना।
वो दिन नहीं भूलता के तुझसे मिला था,
मैं थोड़े क़दम डगमगाए चला था।
के शायद तू लेगी मुझे थाम,
फिर होने लगा मुझे ग़ुमाँ।
के कहीं ये मोहब्बत तो नहीं,
मेरी बचकानी निगाहें देती थी सलाम,
मेरे दिल की धड़कनें - पूर्ण विराम।
तुम भी हँसी, मैं भी हँसा,
मैं हँसा, और फँसा।
उस चेहरे की गहरीयों में,
उन आँखों की पर्चीयों में।
वो ज़ुल्फ़ जो थी घटा ही घटा,
वो चेहरा, पुरनूर सजा।
जो भुला देता था मेरी शायरी का लह्ज़ा,
मेरा प्यार ऐसा, ना हुआ हो कभी जैसा।
वो कहीं हैं, वो यहीं है,
मैं यहाँ हूँ, एक अंकही है,
जो है दरमियाँ।
उफ़्फ़, प्यार की आँधियाँ।
बेहतर हैं ख़ुद सिमट जाएँ,
ये दिल की कश्ती तर जाए।
इसको एक साहिल चाहिए,
एक आशिक़, जाहिल चाहिए।
आज दिल की सुन ली, अब नहि सुनूँगा,
क़सम मोहब्बत की, फिर नहीं लिखूँगा।
क्यूँकि वो महज़ ग़ज़ल नहीं, मेरे दिल की साज़-ओ-आवाज़ है; आबाद है,
वो मेरी है, पर आज़ाद है!
ये आख़री नज़्म है मेरी, मोहब्बत के नाम।
मोहब्बत के नाम,
शब-ए-वस्ल का यूँ हुआ है अंजाम।
के अब बहिस हैं, पर बेताब हैं,
ये जो जले-बुझे चिराग़ हैं,
उनसे गुज़ारिश है मेरी,
ना भेजें ये पेचीदा पैग़ाम,
ना तोड़ें ख़वाबग़ाह के उस चंचल गुलशन के गुल्फ़ाम।
गर ना थी क़ाबिल-ए-मोहब्बत ये क़िस्मत मेरी,
तो क्यूँ हूँ हैरान?
क्यूँ हूँ परेशान?
के ये मेरा अन्दाज़ नहीं,
मोहब्बत है, किसी के मोहताज नहीं,
आज नहीं तो कल तिजारत हो जाएगा इसका नाम,
लो देता हूँ मैं फ़रमान।
थी दिलचस्प कहानी ये मेरी,
था बेवफ़ा जिसका नाम,
ना था कोई वो इंसान।
के ना तो इंकार था, ना ही इकरार था।
मैं यूँ ही फिरता, बेज़ार था।
कर लूँ ज़रा आराम,
के दिल में अब भी सुलगती है तमन्ना, मचलते हैं अरमान।
भूल तो सब कुछ जाऊँ, पर यादाश्त है मेरी,
तेरे कूँचों में फ़ना,
मेरी रेत के क़तरे सी आना।
वो दिन नहीं भूलता के तुझसे मिला था,
मैं थोड़े क़दम डगमगाए चला था।
के शायद तू लेगी मुझे थाम,
फिर होने लगा मुझे ग़ुमाँ।
के कहीं ये मोहब्बत तो नहीं,
मेरी बचकानी निगाहें देती थी सलाम,
मेरे दिल की धड़कनें - पूर्ण विराम।
तुम भी हँसी, मैं भी हँसा,
मैं हँसा, और फँसा।
उस चेहरे की गहरीयों में,
उन आँखों की पर्चीयों में।
वो ज़ुल्फ़ जो थी घटा ही घटा,
वो चेहरा, पुरनूर सजा।
जो भुला देता था मेरी शायरी का लह्ज़ा,
मेरा प्यार ऐसा, ना हुआ हो कभी जैसा।
वो कहीं हैं, वो यहीं है,
मैं यहाँ हूँ, एक अंकही है,
जो है दरमियाँ।
उफ़्फ़, प्यार की आँधियाँ।
बेहतर हैं ख़ुद सिमट जाएँ,
ये दिल की कश्ती तर जाए।
इसको एक साहिल चाहिए,
एक आशिक़, जाहिल चाहिए।
आज दिल की सुन ली, अब नहि सुनूँगा,
क़सम मोहब्बत की, फिर नहीं लिखूँगा।
क्यूँकि वो महज़ ग़ज़ल नहीं, मेरे दिल की साज़-ओ-आवाज़ है; आबाद है,
वो मेरी है, पर आज़ाद है!
ये आख़री नज़्म है मेरी, मोहब्बत के नाम।
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