ऐ मेरे दिल, तू उसी को बुलाता क्या है?
जो कल बिछी बिसात थी,
एक अनकही सी बात की।
तू उस बात को उलझाता क्या है?
उलझ कर खुद को समझाता क्या है?
आएगी वो फ़िर, होगी मुलाक़ात,
करेगा तू ताउम्र फ़रियाद।
इतना वक़्त लगता क्या है?
तू अपने दिल को बताता क्या है?
एक मेरा हिस्सा, एक उसका हिस्सा,
अजब है तेरा ये किस्सा।
थोड़ा है तो थोड़े को चाहता क्या है?
बुझी शम्मा को जलता क्या है?
शम्मा नही तेरा दिल है,
टूटे ख्वाबों का जो बिल है।
उसमे घर बसाता क्या है?
यूँ खुदी को फँसता क्या है?
चली गयी है वो, शायद रेल की तरह,
तेरी मोहब्बत थी खेल की तरह।
अब खिलोने माँगाता क्या है?
किसीको रुझाता क्या है?
रोज़ होते हैं तंज़,
बहुत हो गया रंज।
कविकरन! है मोहब्बत तो छुपाता क्या है?
ये शायरी रोज़ सुनाता क्या है?
No comments:
Post a Comment