Saturday, 28 March 2020

गुब्बारे और गुलछर्रे

जवान इरादे नेक नहीँ होते,
सभी कंवारे दिलफेंक नहीँ होते।
आसमानी लगते तो हैं, मगर,
गुब्बारे और गुलछर्रे एक नही होते।

रँगीले, सजीले गुब्बारे में था,
दरकारी फ़नों के सहारे से था,
खींच ले आए हवाओं के मतवाले झोंके,
सूरज बेबस, बे-तेज, ना आसमान रोके।

नीलगगन में छायी थी होली,
एक रंगीन चिड़िया आयी और बोली।
गलचहारों को धूँड, लगा ना गोतें,
ये गोल ग़ुब्बारे किसी के सगे ना होते।

ग़ुब्बारे में मैं था, चंचल सी वो थी,
पहर दो पहर जो अगर बात होती,
तो हमदम हम एक दिन, एक साथ होते,
मगर मनचलों को क्या हालात रोके?

मैं उड़ता रहा, चला फिर परदेस,
वही थी वो वादी, बस बदला था भेस।
ग़ुब्बारे आते, ग़ुब्बारे जाते, पर टूटे दिल के अरमान रोते,
वो चंचल सुनहरे से पंख अब ना उड़ते।

भूले उसे,  भुला ना सका,
मैं उसको दोबारा बुला ना सका।
दिल की जगह काश वक़्त के काँटे होते,
नशतर से उनके टुकड़े-टुकड़े होते।

तराश लाता लमहों को पर बहक सा गया,
मैं फिर किसी इत्र से महक सा गया।
गर उस दिन होश सम्भाले होते,
तो आज हम घोंसले में पधारे होते।

गुलों में रंग भरे थे, रंगों में जाम,
ग़ुब्बारों के समंदर से सजी हुई थी असमानी शाम।
उस शाम गर हाथ पैमाने होते,
तो फिर मैखाने नीलाम होगाए होते।

दिखा फिर एक हसीन ग़ुब्बारा,
पूछा कितने का था हिसाब सारा।
वो सौदा पूरा किया, काश ना करते,
अपनी नज़रों में दलाल तो ना बनते।

दूर कहीं वो डाली रो रही होगी,
उस चिड़िया के आँसुओं को पिरो रही होगी।
पर हम इतने समझदार कहाँ होते,
बेवक़ूफ़ हो गए बहती नदी में हाथ धोते-धोते।

माँ ने रोका, बाप ने टोका,
ग़ुब्बारा मैं, खा गया धोखा।
काश सेहरा ही रहती ज़िंदगी, सराब ना होते,
उम्र के जलवों में हम यूँ ख़राब ना होते।

लौट के कैसे आते, धड़कने बुलंद गा रहीं थी,
चले गए उसी दिशा में जहाँ से सुगंध आ रही थी।
काम से कम बहन का कहा तो मान गए होते,
ग़ुब्बारों के तौर-तरीक़े पहचान गए होते।

ग़ुब्बारों में ग़ुब्बारा, मैं बाग़ी बेचारा,
उड़ता रहा मायावी आसमान में बंजारा।
चाहत थी चिड़िया की, हाथ आए तोते,
ऐ काश मैंने चश्में लगाए होते।

और ग़ुब्बारों को देखा मैंने, कैसे बेख़ौफ़ उड़ते थे,
शायद उनके दरमियाँ हवा के कारतूस हुआ करते थे।
चले आए स्वदेस, कितने ही दिन रोते,
ग़ुब्बारे ख़्वाब जैसे छूट गए, हम रह गए सोते।

मतवाली घाटा ने आवारा बना दिया,
गुलछर्रों की हवस ने ग़ुब्बारा बना दिया।
चले आए पहले सनम के दर ख़ाली हाथ (क्या ये लिहाज़ होते?!)
ख़ाली हाथ आए थे, ख़ाली हाथ लौटे।






















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