क्या सोच रहा है क्या जाने,
सपने आते हैं रोज़ मगर,
हर रात क्यों लगते अनजाने?
कई ख़्वाबों की गठरी है,
जैसे रेल की पटरी है।
निसदिन गाड़ी रास्ता देखे,
नई बोगी है, वो क्या जाने।
के एक रात कहाँ हम ठहरे हैं,
कई दर-ओ-दीवार पर पहरे हैं,
इधर उधर से उधारी हैं पल दो पल की यादें,
ये सौदाई बंजारा क्या जाने।
क्या जाने दुनिया दारी को,
दीन-ओ-सियासत की रंगदारी को।
जननी बुत परस्ती करती,
वो बुत क्या है, क्या जाने।
सब आधा अधूरा देखा है,
कोई ख्वाब ना पूरा देखा है।
वो डगर डगर और नगर नगर,
भटका है, रास्ता क्या जाने।
सपने में देखा है उसने,
शायद ना पहचाना उसने।
ये सच है के है ये माया,
करवट का व्यापारी क्या जाने।
इन अशारों में,
चंद इशारों में,
ये रात बहती है क़तरा क़तरा,
सावन का दीवाना क्या जाने।
चलता जाता है, छलता जाता है,
रात का मंजर खलता जाता है।
कच्ची नींद से आँख खुली तो है,
पर होश कहाँ है, क्या जाने।
अब होश कहाँ, मदहोशी है,
बस हलचल है बेहोशी है।
कभी लड़ता है, कभी डरता है,
सम क्या है, वो क्या जाने।
ख़्वाबों का गुलाबी दर्पण देखकर,
वो अपनी शराबी निगाहें टेक कर।
उस नाज़नीन को देखने के ढूंढता है बहाने,
लहज़ा क्या है, क्या जाने!
कभी तो ऐनक लगाकर,
वो हाथ से हाथ मिलाकर।
चला है सरकार सजाने,
तज़ुर्बा क्या है, क्या जाने।
कभी बरसती है मीठी बर्फ़,
वो लिखता है यारी दोस्ती के हर्फ़।
चला है पराये को आजमाने,
अपना कौन है, क्या जाने।
सोचता है, खोजता है, हकलाता है,
अपनी हालातों को झुठलाता है।
अश्कों से सना हुआ है तकिया,
ये ख़्वाब क्या हैं, बस वो जाने...
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