Monday, 6 January 2020

ये क्या हो रहा है?


रफ़्ता-रफ़्ता जली है लौ,
नुमाइश की अंज़ूमन में।
आनन-फ़ानन ये क्या हो रहा है,
सियासत की चिलमन में।

ग़म इसका नहीं कि कुछ हो रहा है,
कुछ होता तो कुछ और भी होना लाज़मी था,
होते होते यूँ पहुँचा है अंजाम,
आज आह--तड़प निकलती है, तमाम बदन से।

गिला है के मौजूदा शाह-सवार अब तक ख़ामोश हैं,
गिला है के मुल्क में छाई बेचैनी और बेबसी की आग़ोश है।
गिला है के आज सभी अपनी मालूमात, ख़यालात में बेहोश हैं,
के आक्रोश है आज ज़हन--आवाम में।

कल तक जो यहीं के थे,
आज वो क़ौमी बन गए हैं।
शायरों के आशारों में भी,
मज़हबी पन्ने जुड़ गए हैं।
क्या इतनी मग़रूर है मेरी क़लम निगाह--सियासत में?

ना मैं इस दल का हूँ, 
ना उस पंथ का।
ना मैं इस ख़याल का हूँ,
ना उस विचार का।
फिरदौस धूँदता था कभी, अब शाँती चाहता हूँ मैं अहल--वतन से।



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