के ये नग़मा तो आपने सुना ही होगा।
पर मन में एक सवाल भी आता है,
क्या आपने मेरी नज़्मों को कभी ग़ौर से पढ़ा होगा?
कुछ हँसते गाते अल्फ़ाज़ हैं, धूप-ओ-नूर है,
कहीं ग़म का काला रूप है,
लिखता है मेरा कलम जो चाहे,
इसमे मेरा क्या क़सूर है?
हाँ, कभी हो जाता हूँ मैं निबंधि,
कर लेता हूँ कुछ एक शर्मसार तुकबंदी।
पता सबको होता है,
ख़ता अनजाने नही होती है।
कई बार मेरी नज़्में पढ़कर लोग ज़रा नाराज़ हो जाते हैं।
पढ़ते तो हँसी-खुशी हैं,
कुछ देर बाद मिज़ाज से नासाज़ हो जाते हैं।
हाँ, ग़म-ए-हस्ती भी आते हैं,
मौजों की तराह फिर जाते हैं।
मेरी स्याही तो उन थोड़े से अश्कों की रहबर है,
जो पलकों से काग़ज़ पर यूँ ही छलक जाते हैं।
ग़मो की बात हो, तो इश्क़ कैसे पीछे हट जाए,
एक हम हैं, जिनकी पतंग उड़ते ही कट जाए।
"कविकरन" डर मोहब्बत से, कहीं फ़िर गुमान ना होजाये,
दर्द-ए-मोहब्बत के चलते, तेरी नज़्मों से तेरे टूटे दिल की तख़्ती,
और नुमाया ना हो जाए।
पर क्या मेरे अंधे दर्शक हैं?
जो एक शब्द पर नगमस्तक हैं?
क्या उन्हें ये इल्म है,
के ये कविता किसका चिह्न है?
मेरी सबसे एक ही दरख़्वास्त है,
सराहो वही जो आपको लगता ख़ास है,
मेरा क्या, मैं एक तरफ़ा आशिक़, मेरे दो लव्ज़ ही सच हैं,
बाक़ी सब बकवास है।
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