बेसब्र आँखें, ये बेक़ब्र जिस्म,
ये आह-ओ-फुगाँ भरते मुफ़लिस,
मंज़र लेते खर्राटे हैं,
अब चारों ओर सन्नाटे हैं।
ता-निगाह तेज़ाब फ़ैला है हुआ एक कहर का,
ख़ून के पैराब से रस्ता मिला है सहर का,
एक नए शहर का...
ये शहर बड़ा अंजान है,
नाम है, पर बदनाम है,
गुमनाम है।
ये शहर जो कभी बस्ता था,
जहाँ बच्चा-बच्चा हँसता था,
आज खामोश है,
खानाबदोश है।
गुलज़ार तो है, गुलफ़ाम नहीं,
बंजर ना हो, कोई बाग़ नहीं।
हाँ खेत झुलसते थे पहले,
पर उनमें अब वो बात नहीं।
अब ना किसी का पहरा होगा,
ये सराय भी सेहरा होगा।
जलता है दिन जलता होगा,
ढ़लता है दिन ढ़लता होगा,
अंधियारा घनेहरा होगा।
No comments:
Post a Comment