Sunday, 8 October 2017

एक दौर की बात है

एक दौर की बात है,
जब बादल बरसा करते थे।
जब कागज़ की कश्ती पे तैरते,
बारिश के संदेसे होते थे।

एक दौर की बात है,
जब बच्चे खेला करते थे।
जब बल्लेबाज़ि की खातिर,
लाखों खिलाड़ी होते थे।

एक दौर की बात है,
जब गीत सुरीले होते थे।
जब आशिकों की आशिक़ी के,
लाखों मुखड़े होते थे।

वो दौर कुछ और था,
जैसे कोई वक्त रंगीला।
हर पल ज़िन्दगि का खुशनुमा,
हर दिन सजीला।

एक दौर की बात थी यह,
अब तो कई आएंगे।
मगर बचपन के वो दिन,
याद हमेशा आएंगे।

No comments:

Post a Comment