Wednesday, 18 October 2017

सवेरे सवेरे...

सवेरे सवेरे जब सूरज दस्तक देता है,
मजबूर होकर नींद आँखों से खफा हो जाती है।
करीब छह बजे होते हैं,
जब विद्यालय जाने की तैयारी शुरू हो जाती है।

गर्म चादर के रेशों से जब लड़ कर,
नन्हे सैनिक आते हैं।
बर्फीले पानी की छीटों से मगर,
कमज़ोर वह पड़ जाते हैं।

नाहा धोकर जब बच्चे,
बस्ता ताने होते हैं।
तो गर बाल ना काढ़े हों,
तो सुनने को दस ताने होते हैं।

कुछ ऐसी तड़पती सुबह से गुज़र कर,
हम दिन में थककर आते हैं।
और नींद में डूबने से पहले,
गजर को चुप कराते हैं।

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