Sunday, 29 October 2017

एक अजीब दोस्त

खौफ और खतरा घिरा होता था,
जब किसी का इम्तिहान होता था।
नाम जिसका अब शायद याद नहीं,
किसी शैतान का ख़याल मालूम होता था।

उसकी किताब खोलते ही,
एक अलग सा एहसास होता था।
अजब-गज़ब से अंकों की,
बराबरी का तराज़ू होता था।

थी उसमें कुछ और तसवीरें,
जिन्होनें बदली मेरी तक़दीर।
आखिर रेखा चीरें तो कहाँ चीरें,
ऐसा बुरा था मेरा नसीब।

अंत में एक बिछड़ा यार था,
जिसको बतानी थी उसकी असलियत।
बताते-बताते भर चुका था,
मैं एक भारी कीमत।

एक वही था...
उसकी चर्चा आज भी होती है।
लेकिन जब भी आये वो याद मुझे,
आँख मेरी रोती है।

उसे ना कभी मुझसे नफरत थी,
ना मुझे था उससे कोई गिला।
अचानक इस क़दर उससे चिढ़ मची,
तोडा मैंने यारी का सिलसिला।

जिन्होंने उसे पा लिया,
उन्होंनें कमाल जलवा दिखाया।
मगर अफसोस यह है कि उन नामों में,
नाम मेरा ना आया।

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