Friday, 23 June 2017

गुज़रे हुए वक्त की कैद में...

अक़्सर मेरी ख़्वाबों में,
होती है गुज़रे कल से गुफ़्तगू।
मुझको भी है किसी दर्द के मरहम की, उससे आरज़ू।

क्यों मैं गुज़रे कल में, यूं उलझा रहता हूँ?
क्यों मैं शीशे सी यादों में, टूटा रहता हूँ?

बीते ज़माने की कैद में, मुझको फसा गया,
जो कल्पा मैं थोड़ी देर, कम्बख्त और भी रुला गया।

वक़्त का खेल है यह शायद,
या मेरा ही फ़साना है
के ए गुज़रे हुए कल तेरा मेरा,
यह रिश्ता पुराना है।

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