सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर नेकी की उम्र दराज़ दी जाती।
तो ज़िन्दगि जो फिलहाल ज़ुल्म की बिसात है,
उसमे चन्द मोहरों को ज़िन्दगि मिल जाती।
सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
की वक्त कुछ पल ठहर जाता।
की बचपन को सही गलत की अर्थशास्त्र से,
यूं बेचा ना जाता।
सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर डर कहीं दूर जानिब होता।
जब चैन की नींद और एक मुस्कुराते सवेरे को,
हर बच्चा मुक्कम्मल करता।
सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर शौहरत की दौलत कमाने में,
उसूलों की क़ुरबानी ना देनी पड़ती,
क्या हम-हम रहते,
और क्या तुम्हे अपनी असली परछाई नज़र पड़ती?