Tuesday, 12 December 2017

यूं होता तो क्या होता

सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर नेकी की उम्र दराज़ दी जाती।
तो ज़िन्दगि जो फिलहाल ज़ुल्म की बिसात है,
उसमे चन्द मोहरों को ज़िन्दगि मिल जाती।

सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
की वक्त कुछ पल ठहर जाता।
की बचपन को सही गलत की अर्थशास्त्र से,
यूं बेचा ना जाता।

सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर डर कहीं दूर जानिब होता।
जब चैन की नींद और एक मुस्कुराते सवेरे को,
हर बच्चा मुक्कम्मल करता।

सोचता हूँ, यूं होता तो क्या होता,
गर शौहरत की दौलत कमाने में,
उसूलों की क़ुरबानी ना देनी पड़ती,
क्या हम-हम रहते,
और क्या तुम्हे अपनी असली परछाई नज़र पड़ती?

Saturday, 4 November 2017

एक नज़्म का सफ़र

जब कोई ख्वाब,
एक रोज़ रात को आता है।
पकड़कर कलम-किताब,
कुछ लिखने को जी ललचाता है।

होते हैं ख़याल, होता है दस्तूर,
मगर अल्फाज़ कर देते हैं मजबूर।

कैसे एक एहसास को,
लव्ज़ों में बयाँ किया जाए।
किस तरह इस उलझन को,
शायराना अंदाज़ में सुलझाया जाए।

मन का दामन छोड कर लव्ज़,
कहाँ आसानी से आते है?
यह तो इस दिल तक का सफ़र,
तय करके आते हैं।

खूब सलाह-मश्वरा कर,
जब कई ख़याल भर आते हैं।
रात की प्यारी लोरियाँ सुन कर,
हम नींद में फिर गुमशुदा हो जाते हैं।

Sunday, 29 October 2017

एक अजीब दोस्त

खौफ और खतरा घिरा होता था,
जब किसी का इम्तिहान होता था।
नाम जिसका अब शायद याद नहीं,
किसी शैतान का ख़याल मालूम होता था।

उसकी किताब खोलते ही,
एक अलग सा एहसास होता था।
अजब-गज़ब से अंकों की,
बराबरी का तराज़ू होता था।

थी उसमें कुछ और तसवीरें,
जिन्होनें बदली मेरी तक़दीर।
आखिर रेखा चीरें तो कहाँ चीरें,
ऐसा बुरा था मेरा नसीब।

अंत में एक बिछड़ा यार था,
जिसको बतानी थी उसकी असलियत।
बताते-बताते भर चुका था,
मैं एक भारी कीमत।

एक वही था...
उसकी चर्चा आज भी होती है।
लेकिन जब भी आये वो याद मुझे,
आँख मेरी रोती है।

उसे ना कभी मुझसे नफरत थी,
ना मुझे था उससे कोई गिला।
अचानक इस क़दर उससे चिढ़ मची,
तोडा मैंने यारी का सिलसिला।

जिन्होंने उसे पा लिया,
उन्होंनें कमाल जलवा दिखाया।
मगर अफसोस यह है कि उन नामों में,
नाम मेरा ना आया।

Wednesday, 18 October 2017

सवेरे सवेरे...

सवेरे सवेरे जब सूरज दस्तक देता है,
मजबूर होकर नींद आँखों से खफा हो जाती है।
करीब छह बजे होते हैं,
जब विद्यालय जाने की तैयारी शुरू हो जाती है।

गर्म चादर के रेशों से जब लड़ कर,
नन्हे सैनिक आते हैं।
बर्फीले पानी की छीटों से मगर,
कमज़ोर वह पड़ जाते हैं।

नाहा धोकर जब बच्चे,
बस्ता ताने होते हैं।
तो गर बाल ना काढ़े हों,
तो सुनने को दस ताने होते हैं।

कुछ ऐसी तड़पती सुबह से गुज़र कर,
हम दिन में थककर आते हैं।
और नींद में डूबने से पहले,
गजर को चुप कराते हैं।

Tuesday, 10 October 2017

सब्ज़ी की समस्या!

एक भोले पतिदेव खड़े थे बीच बाजार,
क़तर में ऐसे थे कई हज़ार।

बीवी ने भेजी थी एक सामग्री,
थी मची पति के दिमाग में अफरा तफरी!

टमाटर, आलू आदि देख,
जब उनको पानी आता था।
आज वही कम्बख्त सब्जी देख,
उनका सर चकराता था।

किसी का असाधारण आकार था,
तो कोई कीड़े का शिकार था!

आये जनाब लेने टमाटर,
तो किसी ने दिखाया शीशा बार बार।
जब देखा आईने में,
तो लाल हो गए थे उनके रुखसार!

कोई था बासी, किसी का हरा रंग था,
टमाटर की विचित्रता से, आदमी तंग था।

घर पहुचे तो पत्नी को बोले पतिदेव,
अबसे पूजा करूंगा तुम्हारी सदैव।

कैसे तुम एक आलू को, ढंग से परख पाती हो?
टमाटर को भी कहाँ से तुम, ढून्ढ ढून्ढ कर लाती हो?

हंस कर बोली बीवी,
मैं तो आसान काम करती हूँ।
जब भी लेती हूँ आलू,
तुम्हारा चेहरा याद करती हूँ!

Sunday, 8 October 2017

एक दौर की बात है

एक दौर की बात है,
जब बादल बरसा करते थे।
जब कागज़ की कश्ती पे तैरते,
बारिश के संदेसे होते थे।

एक दौर की बात है,
जब बच्चे खेला करते थे।
जब बल्लेबाज़ि की खातिर,
लाखों खिलाड़ी होते थे।

एक दौर की बात है,
जब गीत सुरीले होते थे।
जब आशिकों की आशिक़ी के,
लाखों मुखड़े होते थे।

वो दौर कुछ और था,
जैसे कोई वक्त रंगीला।
हर पल ज़िन्दगि का खुशनुमा,
हर दिन सजीला।

एक दौर की बात थी यह,
अब तो कई आएंगे।
मगर बचपन के वो दिन,
याद हमेशा आएंगे।

Friday, 23 June 2017

गुज़रे हुए वक्त की कैद में...

अक़्सर मेरी ख़्वाबों में,
होती है गुज़रे कल से गुफ़्तगू।
मुझको भी है किसी दर्द के मरहम की, उससे आरज़ू।

क्यों मैं गुज़रे कल में, यूं उलझा रहता हूँ?
क्यों मैं शीशे सी यादों में, टूटा रहता हूँ?

बीते ज़माने की कैद में, मुझको फसा गया,
जो कल्पा मैं थोड़ी देर, कम्बख्त और भी रुला गया।

वक़्त का खेल है यह शायद,
या मेरा ही फ़साना है
के ए गुज़रे हुए कल तेरा मेरा,
यह रिश्ता पुराना है।

Wednesday, 29 March 2017

काँच की ज़िन्दगि

ज़िन्दगी किस तरफ है तेरा काफ़िला?
कहाँ है तेरी मंज़िल बता।
मुश्किलों से जूझता मैं,
दरबदर हूँ भटकता।

सपने जो किसी रोज़ रेशमी होते थे,
अब बन गए हैं काँच के,
आशा की आग के जलवे।
अब हो गए हैं राख के।

काँच के ख़्वाब, टूट कर ज़माने की दलदल में धस गए हैं,
जीवन की किस राह पर आकर, हम फस गए हैं।

अगर सुनता है, ऊपरवाले, यह बता तेरी रज़ा क्या है?
अगर यह ज़िन्दगी तेरी दुआ है, तो सज़ा क्या है?

Friday, 20 January 2017

एक फौजी की दास्ताँ...

माँ, मुझे अब सोने दे,
मीठे सपनों में खोने दे।

फिर नाजाने कब सवेरा आएगा,
वतन पर अमन का परचम लहराएगा।

फिर नाजाने कब कोई चुनौती आ जाए,
मुझे प्राणों की आहुति देनी पड़ जाए।

रात की चंद घड़ियाँ, क्यों नापता है, ऐ वक्त?
मैं तो तुझसे मांगूं, चैन की नींद फ़क़त।

फिर फर्ज़ दस्तक देता है,
और देशवासी सो जाते हैं।
फिर सरहद पर मेरे साथी,
डटकर खड़े हो जाते हैं।

फिर जंग में लड़ते लड़ते, जब पल संघर्ष के आते हैं,
एक आग भड़कती है तन में, और शोले उमड़ आते हैं।

क्या बताऊँ माँ,
अंगारे बरसते है सीने में।
वह आग भस्म ना होगी माँ,
जब तक ना आऊं तिरंगे में,
जब तक ना आऊं तिरंगे में।

जय हिंद!