Sunday, 29 October 2017

एक अजीब दोस्त

खौफ और खतरा घिरा होता था,
जब किसी का इम्तिहान होता था।
नाम जिसका अब शायद याद नहीं,
किसी शैतान का ख़याल मालूम होता था।

उसकी किताब खोलते ही,
एक अलग सा एहसास होता था।
अजब-गज़ब से अंकों की,
बराबरी का तराज़ू होता था।

थी उसमें कुछ और तसवीरें,
जिन्होनें बदली मेरी तक़दीर।
आखिर रेखा चीरें तो कहाँ चीरें,
ऐसा बुरा था मेरा नसीब।

अंत में एक बिछड़ा यार था,
जिसको बतानी थी उसकी असलियत।
बताते-बताते भर चुका था,
मैं एक भारी कीमत।

एक वही था...
उसकी चर्चा आज भी होती है।
लेकिन जब भी आये वो याद मुझे,
आँख मेरी रोती है।

उसे ना कभी मुझसे नफरत थी,
ना मुझे था उससे कोई गिला।
अचानक इस क़दर उससे चिढ़ मची,
तोडा मैंने यारी का सिलसिला।

जिन्होंने उसे पा लिया,
उन्होंनें कमाल जलवा दिखाया।
मगर अफसोस यह है कि उन नामों में,
नाम मेरा ना आया।

Wednesday, 18 October 2017

सवेरे सवेरे...

सवेरे सवेरे जब सूरज दस्तक देता है,
मजबूर होकर नींद आँखों से खफा हो जाती है।
करीब छह बजे होते हैं,
जब विद्यालय जाने की तैयारी शुरू हो जाती है।

गर्म चादर के रेशों से जब लड़ कर,
नन्हे सैनिक आते हैं।
बर्फीले पानी की छीटों से मगर,
कमज़ोर वह पड़ जाते हैं।

नाहा धोकर जब बच्चे,
बस्ता ताने होते हैं।
तो गर बाल ना काढ़े हों,
तो सुनने को दस ताने होते हैं।

कुछ ऐसी तड़पती सुबह से गुज़र कर,
हम दिन में थककर आते हैं।
और नींद में डूबने से पहले,
गजर को चुप कराते हैं।

Tuesday, 10 October 2017

सब्ज़ी की समस्या!

एक भोले पतिदेव खड़े थे बीच बाजार,
क़तर में ऐसे थे कई हज़ार।

बीवी ने भेजी थी एक सामग्री,
थी मची पति के दिमाग में अफरा तफरी!

टमाटर, आलू आदि देख,
जब उनको पानी आता था।
आज वही कम्बख्त सब्जी देख,
उनका सर चकराता था।

किसी का असाधारण आकार था,
तो कोई कीड़े का शिकार था!

आये जनाब लेने टमाटर,
तो किसी ने दिखाया शीशा बार बार।
जब देखा आईने में,
तो लाल हो गए थे उनके रुखसार!

कोई था बासी, किसी का हरा रंग था,
टमाटर की विचित्रता से, आदमी तंग था।

घर पहुचे तो पत्नी को बोले पतिदेव,
अबसे पूजा करूंगा तुम्हारी सदैव।

कैसे तुम एक आलू को, ढंग से परख पाती हो?
टमाटर को भी कहाँ से तुम, ढून्ढ ढून्ढ कर लाती हो?

हंस कर बोली बीवी,
मैं तो आसान काम करती हूँ।
जब भी लेती हूँ आलू,
तुम्हारा चेहरा याद करती हूँ!

Sunday, 8 October 2017

एक दौर की बात है

एक दौर की बात है,
जब बादल बरसा करते थे।
जब कागज़ की कश्ती पे तैरते,
बारिश के संदेसे होते थे।

एक दौर की बात है,
जब बच्चे खेला करते थे।
जब बल्लेबाज़ि की खातिर,
लाखों खिलाड़ी होते थे।

एक दौर की बात है,
जब गीत सुरीले होते थे।
जब आशिकों की आशिक़ी के,
लाखों मुखड़े होते थे।

वो दौर कुछ और था,
जैसे कोई वक्त रंगीला।
हर पल ज़िन्दगि का खुशनुमा,
हर दिन सजीला।

एक दौर की बात थी यह,
अब तो कई आएंगे।
मगर बचपन के वो दिन,
याद हमेशा आएंगे।