Sunday, 16 February 2020

कच्छप

क़दम देख के चलना,
अतीत को ले के चलते हो।
पैदा हुआ नहीं है जो उसको,
तुम यतीम कर के चलते हो।

ये भंग तुम्हारी है,
ये जंग तुम्हारी है।
इन ख़ून से सनी हवाओं में,
किसके क़श भरते हो?

क़दम देख के चलना,
तुम्हारा कल तुम्हारे कल की पहचान है।
इस प्रतिघात की कसौटी पर,
जुर्म-ओ-ज़ुल्म के मुखौटे पर,
कितना ख़रा उतरते हो?
तुम क्या दुनिया से डरते हो!

यूँ की हम सब जान रहे हैं,
सूची-सामग्री बाँध रहे हैं।
क्या लेके आए थे हम?
क्या ख़ाक लेकर तुम जाते हो?

भाषा पे मत जाना मेरी,
तहज़ीब ना सिखलाना ये भी,
मेरा अपना अन्दाज़ है,
तुम कहाँ की लाते हो?

साये से डर लगने लगा है,
एक अनजान ख़ौफ़ घर करने लगा है।
के हम साथ हैं पर साथ नहीं,
क्या पता तुम कोई चाणक्य-धारी हो?

जान बड़ी या माल बड़ा है,
उससे बड़ा एक सवाल खड़ा है,
जिस ख़ून के जन्मे हो तुम?
लानत है! क्या उसी की दलाली हो?
अरे, मौत की क़व्वाली हो?!

मौत के कुछ पलछिन बाद ये भी हो सकता है,
क़ू-ब-क़ू, हू-ब-हू हो सकता है।
तेरा कल तुझे बुलाता हो,
तेरे आज को मिटाने को।










Wednesday, 12 February 2020

आख़री नज़्म

ये आख़री नज़्म है मेरी,
मोहब्बत के नाम,
शब-ए-वस्ल का यूँ हुआ है अंजाम।

के अब बहिस हैं, पर बेताब हैं,
ये जो जले-बुझे चिराग़ हैं,
उनसे गुज़ारिश है मेरी,
ना भेजें ये पेचीदा पैग़ाम,
ना तोड़ें ख़वाबग़ाह के उस चंचल गुलशन के गुल्फ़ाम।

गर ना थी क़ाबिल-ए-मोहब्बत ये क़िस्मत मेरी,
तो क्यूँ हूँ हैरान?
क्यूँ हूँ परेशान?

के ये मेरा अन्दाज़ नहीं,
मोहब्बत है, किसी के मोहताज नहीं,
आज नहीं तो कल तिजारत हो जाएगा इसका नाम,
लो देता हूँ मैं फ़रमान।

थी दिलचस्प कहानी ये मेरी,
था बेवफ़ा जिसका नाम,
ना था कोई वो इंसान।

के ना तो इंकार था, ना ही इकरार था।
मैं यूँ ही फिरता, बेज़ार था।
कर लूँ ज़रा आराम,
के दिल में अब भी सुलगती है तमन्ना, मचलते हैं अरमान।

भूल तो सब कुछ जाऊँ, पर यादाश्त है मेरी,
तेरे कूँचों में फ़ना,
मेरी रेत के क़तरे सी आना।

वो दिन नहीं भूलता के तुझसे मिला था,
मैं थोड़े क़दम डगमगाए चला था।
के शायद तू लेगी मुझे थाम,
फिर होने लगा मुझे ग़ुमाँ।

के कहीं ये मोहब्बत तो नहीं,
मेरी बचकानी निगाहें देती थी सलाम,
मेरे दिल की धड़कनें - पूर्ण विराम।

तुम भी हँसी, मैं भी हँसा,
मैं हँसा, और फँसा।
उस चेहरे की गहरीयों में,
उन आँखों की पर्चीयों में।

वो ज़ुल्फ़ जो थी घटा ही घटा,
वो चेहरा, पुरनूर सजा।
जो भुला देता था मेरी शायरी का लह्ज़ा,
मेरा प्यार ऐसा, ना हुआ हो कभी जैसा।

वो कहीं हैं, वो यहीं है,
मैं यहाँ हूँ, एक अंकही है,
जो है दरमियाँ।
उफ़्फ़, प्यार की आँधियाँ।

बेहतर हैं ख़ुद सिमट जाएँ,
ये दिल की कश्ती तर जाए।
इसको एक साहिल चाहिए,
एक आशिक़, जाहिल चाहिए।

आज दिल की सुन ली, अब नहि सुनूँगा,
क़सम मोहब्बत की, फिर नहीं लिखूँगा।
क्यूँकि वो महज़ ग़ज़ल नहीं, मेरे दिल की साज़-ओ-आवाज़ है; आबाद है,
वो मेरी है, पर आज़ाद है!

ये आख़री नज़्म है मेरी, मोहब्बत के नाम।







Monday, 10 February 2020

कल की तस्वीर

कल की तस्वीर से आज को सजाता क्या है?
ऐ मेरे दिल, तू उसी को बुलाता क्या है?

जो कल बिछी बिसात थी,
एक अनकही सी बात की।
तू उस बात को उलझाता क्या है?
उलझ कर खुद को समझाता क्या है?

आएगी वो फ़िर, होगी मुलाक़ात,
करेगा तू ताउम्र फ़रियाद।
इतना वक़्त लगता क्या है?
तू अपने दिल को बताता क्या है?

एक मेरा हिस्सा, एक उसका हिस्सा,
अजब है तेरा ये किस्सा।
थोड़ा है तो थोड़े को चाहता क्या है?
बुझी शम्मा को जलता क्या है?

शम्मा नही तेरा दिल है,
टूटे ख्वाबों का जो बिल है।
उसमे घर बसाता क्या है?
यूँ खुदी को फँसता क्या है?

चली गयी है वो, शायद रेल की तरह,
तेरी मोहब्बत थी खेल की तरह।
अब खिलोने माँगाता क्या है?
किसीको रुझाता क्या है?

रोज़ होते हैं तंज़,
बहुत हो गया रंज।
कविकरन! है मोहब्बत तो छुपाता क्या है?
ये शायरी रोज़ सुनाता क्या है?