ख़ुशी क्या है?
एक शीशे का मकान है।
पल भर की रौशनी है,
फिर ग़म का अकाल है।
हसीन हसरतों की बेबुनियाद दुनिया,
क्या जन्नत सी लगती है!
कभी कभी तो यूं लगता है कि लाखों कलियां,
दिल के बागों में खिलाती हैं।
कब तक रहेगी ये ख़ुशी?
कितनी होगी इसकी बरक़त?
या फिर कटेगी बेज़ार सी ज़िन्दगि,
और आएगी क़यामत।
ख़ुशी क्या है?
अजीब सवाल है,
जो ढूंढने चला था उसे,
उसका हाल बेहाल है।
यह जो खेल है दुनिया,
जिसके हैं हम नाज़रीन।
सिमटी हुई हैं उसमें कुछ घड़ियाँ,
जो हैं नरगिसी, जो हैं आफ़रीन।
इन्ही छोटी घड़ियों में,
वक्त का बसेरा हो जाए।
काश इस काँच के मकान को,
थोड़ी रौशनी, थोड़ी चांदनी मिल जाय।
Well said KARAN..... !!!!
ReplyDeleteAwesome junior Dhall. Simply awesome
ReplyDeleteExcellent stuff
ReplyDeleteWonderfully described!
ReplyDeleteFantabulous Karan... keep it up!!!
ReplyDeleteWow....nice work again
ReplyDelete