Friday, 28 September 2018

ग़म की बिसात

दावा क्या करेगी?
क्या करेगी महफ़िल?
सामने वाला, राह तमाम ख़ुशियों की,
ताकता रह जायेगा।

दुआ क्या करेगी,
क्या होगा हासिल?
ग़म के घने कोहरे से गुप्त किसी बिसात का,
मोहरा बन जायेगा।

यह ग़म की राहें, बेबस आहें,
किस जानिब आखिर जाएंगी?
अब मुझपर किस तरह का,
सलूप कर जाएगी?

टूट गया हूँ इस कदर,
की कोई शख्स नही भाता है।
जो शीशे के मकान में दस्तक दे कोई,
तो अपना ही अक्स नज़र आता है।

मैं मजबूर सही, मगर हालात ऐसे हैं,
चुप कैसे रहूँ, जज़बात ऐसे हैं।

लेकिन हिम्मत की बुनियाद,
अब भी फौलादी है,
कुछ खुशनुमा खयालों की इस ईमान में,
अब भी आबादी है।








1 comment:

  1. बहुत ख़ूब करन बेटा ......

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