आजकल जिंदगीं का यह आलम है,
तलातुम है, आनन् फ़ानन है।
जीने की तमन्ना लिए,
कुछ सपने लिए, अरमान लिए, (गुज़रे और आने वाले कल की राहों पर,)
एक रोज़ वो सैर करता हैं,
शामों सहेर करता हैं।
कहीं दर्द का साया है,
कहीं खुशियों की माया है
ज़िन्दगि की रफ़्तार ने,
इंसान को बखूबी भगाया है।
कुछ होश नहीं,
जीना दुश्वार है
इंसान की बेबस तन्हाई का,
सबब ही ये कम्बख्त रफ़्तार है।
जानता नहीं आस पड़ोस,
पैसों में ढूंढता है फिरदौस।
इसी पैसे से वो दिल को बहलाता है,
हफ्ते भर पिस कर, मौज उड़ाता है।
(मगर) अकेला खो गया है, भरी-भरी है महफ़िल,
अकेला अश्क बहाता है, क्या करेगा हासिल?
दूर कहीं है उसका घर, पास है जन्नत की मंज़िल।
भूले बिसरे शिकवों की तलवार दिल पर लिए,
जलते हैं उसकी आँखों में, टूटे सपनों के दिए,
याद करता है वो तोड़े हुए वादे, जो कभी खुद से थे किये।
याद करता है वो तोड़े हुए वादे, जो कभी खुद से थे किये।
क्या रिश्ते, क्या नाते, एक दिन सब छूट जाता है।
खुद से इस ज़िन्दगि की रफ़्तार में लड़ते लड़ते,
इंसान पूरी तरह टूट जाता है।
दर्द होता है, होता है अफ़सोस,
ऐसे किस्से सुनने में आते हैं हर रोज़।
क्या किया जाए, उसको चैन कहाँ है,
इंसान जो जीते जी यहाँ मर रहा है,
तो ज़िंदा कहाँ है?
दर्द होता है, होता है अफ़सोस,
ऐसे किस्से सुनने में आते हैं हर रोज़।
क्या किया जाए, उसको चैन कहाँ है,
इंसान जो जीते जी यहाँ मर रहा है,
तो ज़िंदा कहाँ है?
So beautifully composed !
ReplyDeleteकरन बेटा..... बहुत खूब लिखते हो...
ReplyDeleteऐसा लिखने वाला बहुत ही परिपक्व व्यक्तित्व का धनी और ज़िन्दगी को बहुत गहराई तक समझने वाला ही हो सकता है....
तुम्हें बहुत बहुत शुभकामनाएं ... कि तुम अच्छा लिखते रहो और अपनी कलम से अपने विचारों को दुनिया तक ला सको
Very pertinent
ReplyDeleteKaran , Excellent philosophical thoughts, new age Guljaar in making ..God bless you
ReplyDeleteAwesome Karan - very well articulated and conposed !!!
ReplyDeleteThank you everyone!☺😊
ReplyDeleteSuper.
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