Sunday, 25 November 2018

मैं आईना हूँ

मैं आईना हूँ,
इस सितमगर वक्त से मेरा बरसों का याराना है।
यह काँच मेरा, एक सदी का सफर है
एक उम्र का फसाना है।

तुम जब रूबरू आई बचपन में,
ज़ुल्फ़ सवारते देखा है तुम्हे।
वो सजने सवरने की आड़ में,
अरसों तक निहारा है तुम्हे।

तुम कभी कभी जो खफा,
जो मुझसे हो जाति थी।
अपने मेहबूब की आंखों को,
मेरे जैसा बताती।

शायद तस्सली ना दे पाया तुम्हे,
तुम्हारे मन मे था जवान उमंगों का रक्स।
अफसोस, तुमको ना दिखा सका मैं,
एक हूर-पारी सा अक्स।

ले ली तुमने जब रंग रूप से रुखसत,
तुम्हारे चंचल नैनों को कहाँ थी फुरसत।
उम्र की रफ़्तार को थमा ना सका,
मैं तुम्हारे चेहरे की झुर्रियाँ छुपा ना सका।

रोज़ मेरे इस शीशे से,
एक और ज़िन्दगि जुड़ जाती है।
कभी रूठ जाते हैं लोग मुझसे,
कभी मेरा दीदार करके उनको तस्सली मिल जाती है।

मैं आईना हूँ,
किसीका ख्वाब नही।
कितना कुछ कह जाती हैं मेरी आँखें,
सदियों से हैं जो बेज़ुबान रहीं।


Friday, 28 September 2018

ग़म की बिसात

दावा क्या करेगी?
क्या करेगी महफ़िल?
सामने वाला, राह तमाम ख़ुशियों की,
ताकता रह जायेगा।

दुआ क्या करेगी,
क्या होगा हासिल?
ग़म के घने कोहरे से गुप्त किसी बिसात का,
मोहरा बन जायेगा।

यह ग़म की राहें, बेबस आहें,
किस जानिब आखिर जाएंगी?
अब मुझपर किस तरह का,
सलूप कर जाएगी?

टूट गया हूँ इस कदर,
की कोई शख्स नही भाता है।
जो शीशे के मकान में दस्तक दे कोई,
तो अपना ही अक्स नज़र आता है।

मैं मजबूर सही, मगर हालात ऐसे हैं,
चुप कैसे रहूँ, जज़बात ऐसे हैं।

लेकिन हिम्मत की बुनियाद,
अब भी फौलादी है,
कुछ खुशनुमा खयालों की इस ईमान में,
अब भी आबादी है।








Thursday, 19 July 2018

ख़ुशी क्या है?

ख़ुशी क्या है?
एक शीशे का मकान है।
पल भर की रौशनी है,
फिर ग़म का अकाल है।

हसीन हसरतों की बेबुनियाद दुनिया,
क्या जन्नत सी लगती है!
कभी कभी तो यूं लगता है कि लाखों कलियां,
दिल के बागों में खिलाती हैं।

कब तक रहेगी ये ख़ुशी?
कितनी होगी इसकी बरक़त?
या फिर कटेगी बेज़ार सी ज़िन्दगि,
और आएगी क़यामत।

ख़ुशी क्या है?
अजीब सवाल है,
जो ढूंढने चला था उसे,
उसका हाल बेहाल है।

यह जो खेल है दुनिया,
जिसके हैं हम नाज़रीन।
सिमटी हुई हैं उसमें कुछ घड़ियाँ,
जो हैं नरगिसी, जो हैं आफ़रीन।

इन्ही छोटी घड़ियों में,
वक्त का बसेरा हो जाए।
काश इस काँच के मकान को,
थोड़ी रौशनी, थोड़ी चांदनी मिल जाय।

Friday, 6 July 2018

आनन् फ़ानन ज़िन्दगि

आजकल जिंदगीं का यह आलम है,
तलातुम है, आनन् फ़ानन है।

जीने की तमन्ना लिए,
कुछ सपने लिए, अरमान लिए, (गुज़रे और आने वाले कल की राहों पर,)
एक रोज़ वो सैर करता हैं,
शामों सहेर करता हैं।

कहीं दर्द का साया है,
कहीं खुशियों की माया है
ज़िन्दगि की रफ़्तार ने,
इंसान को बखूबी भगाया है।

कुछ होश नहीं,
जीना दुश्वार है
इंसान की बेबस तन्हाई का,
सबब ही ये कम्बख्त रफ़्तार है।

जानता नहीं आस पड़ोस,
पैसों में ढूंढता है फिरदौस।
इसी पैसे से वो दिल को बहलाता है,
हफ्ते भर पिस कर, मौज उड़ाता है।

(मगर) अकेला खो गया है, भरी-भरी है महफ़िल,
अकेला अश्क बहाता है, क्या करेगा हासिल?
दूर कहीं है उसका घर, पास है जन्नत की मंज़िल।

भूले बिसरे शिकवों की तलवार दिल पर लिए,
जलते हैं उसकी आँखों में, टूटे सपनों के दिए,
याद करता है वो तोड़े हुए वादे, जो कभी खुद से थे किये।

क्या रिश्ते, क्या नाते, एक दिन सब छूट जाता है।
खुद से इस ज़िन्दगि की रफ़्तार में लड़ते लड़ते,
इंसान पूरी तरह टूट जाता है।

दर्द होता है, होता है अफ़सोस,
ऐसे किस्से सुनने में आते हैं हर रोज़।
क्या किया जाए, उसको चैन कहाँ है,
इंसान जो जीते जी यहाँ मर रहा है,
तो ज़िंदा कहाँ है?




Thursday, 1 March 2018

अमन

दो मुल्कों में छाया,
यह कैसा सन्नाटा है?
लगता है मामला-ए-जंग,
फिर सामने आया है।

गली गली खून बहे,
जन्नत की फ़िराक में।
जवान मारे जा रहे हैं,
रात ही रात में।

दुश्मनी और जंग के बीजों से बोई हुई ज़मीन,
अब काफी उपजाऊ है।
यलगार के मझधारे में,
डामाडोल मुल्कों की नाव है।

इन्सानियत ने रुख मोड़ लिया है,
जाहिलों से रिश्ता जोड़ लिया है।
एक मुल्क ने दुसरे का,
आपसी भरोसा तोड़ दिया है।

(ऐ काश अमन का चमन,
आ जाए ज़मीन पर,
गर यहाँ जन्नत होती,
तो नज़ारा और होता)