Tuesday, 14 April 2020

संविधान और मेरा दिल

सावरकर कहते हैं वो मुझको,
पर दिल तो वामपंथी है।
ना जाने फ़िर कहाँ से आई,
ऐसी कट्टरपंती है?

वो कट्टरपंती जो कभी किसी को,
छोटा बड़ा ना तोलती हो।
वो कट्टरपंती जो सभी मसलों को,
एक नाप में तोलती हो।

वो कट्टरपंती जो संविधान को,
पूजती और सरहाती है,
निरपेक्षता के विवाद पे उसकी,
गाड़ी फ़िर थम जाती है।

दिल दहलता है ऊंच नीच की राहों से,
धर्मों को ढाल बनाने से।
कवि की हैसियत से कहता हूँ,
डर लगता है फ़िर ज़माने से।

फिर पन्ने पलटे कानूनी,
जानने थे कुछ राज़ ज़रूरी।
एक नज़र में जान गए,
उस बे-दिल को पहचान गए।

कवि थे, रो दिए,
दो घड़ी राजनीति को छोड़ दिए।
कवि थे ना! नादान थे,
इसकी क़लम से अनजान थे।

वो कलम जिसने कल लिखा,
कल को परसों बनाती है,
हाँ, हाँ ये मोटी किताब,
मेरा देश चलाती है।

चले आए कविकरन,
देश बदलने, बनाने।
दिल की धड़कन और उल्फ़त में,
बन गए रोज़ फसाने।

भुकमरी ओर गरीबी से,
धनवानों की जागीरों से,
वो दिल कितना रोता जो जुड़ा है,
लाखों की ताक़दीरों से।

ये संविधान इश्क़ से नही,
मस्तिष्क से बना है।
इसकी स्याही में,
पूरा न्यायालय सना है।

ये बे-दिल है, बे-हिस नही,
हम ख़फ़ा ज़रूर हों, बेबस नहीं।
शुक्र है सिर्फ दिमाग है इसका,
दिल पे तो किसी का बस नही।

Sunday, 12 April 2020

आधा

आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे,
वो आधी आधी नींद में काटी,
आधी आधी रातें।

सादा मेरा इश्क़ मगर वो आधा आधा लगता है,
खत लिखता हूँ महबूबा को, चेहरा आधा दिखता है।
कब जाने सर चढ़ गईं, घर कर गईं फज़ूल की बातें,
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

वो ख़्वाब भी क्या ख़्वाब है जो दोबारा ना बिक सके,
वो आधा ही सादा है, जो पूरा सा दिख सके।
सुर्खियों को पढ़कर याद आती हैं हर्फ़ की आहें,
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

तस्करी निभाते निभाते कहाँ पहुँच चुका हूँ,
मैं अपने ही जिस्म-ओ-आवाज़ में आधा बंट चुका हूँ।
आधे मेरे जलवे हैं, आधे मेरे इरादे।
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

फ़ुरसत मिले तो इस किरदार से इश्क़ फ़ॉर्मना,
मालूम है मुझे, ज़ालिम है ज़माना।

अमावस सनी है हवस की आहों से,
पुरनूर रातें सजी हैं फ़रेबी सितारों से।
चले आओ के चाँद आधा है,
करनी है कुछ बातें।
आधी आधी कसमें हैं,
आधे आधे वादे।

Monday, 6 April 2020

सपना

ये मन वंछित सा रहता है,
क्या सोच रहा है क्या जाने,
सपने आते हैं रोज़ मगर,
हर रात क्यों लगते अनजाने?

कई ख़्वाबों की गठरी है,
जैसे रेल की पटरी है।
निसदिन गाड़ी रास्ता देखे,
नई बोगी है, वो क्या जाने।

के एक रात कहाँ हम ठहरे हैं,
कई दर-ओ-दीवार पर पहरे हैं,
इधर उधर से उधारी हैं पल दो पल की यादें,
ये सौदाई बंजारा क्या जाने।

क्या जाने दुनिया दारी को,
दीन-ओ-सियासत की रंगदारी को।
जननी बुत परस्ती करती,
वो बुत क्या है, क्या जाने।

सब आधा अधूरा देखा है,
कोई ख्वाब ना पूरा देखा है।
वो डगर डगर और नगर नगर,
भटका है, रास्ता क्या जाने।

सपने में देखा है उसने,
शायद ना पहचाना उसने।
ये सच है के है ये माया,
करवट का व्यापारी क्या जाने।

इन अशारों में,
चंद इशारों में,
ये रात बहती है क़तरा क़तरा,
सावन का दीवाना क्या जाने।

चलता जाता है, छलता जाता है,
रात का मंजर खलता जाता है।
कच्ची नींद से आँख खुली तो है,
पर होश कहाँ है, क्या जाने।

अब होश कहाँ, मदहोशी है,
बस हलचल है बेहोशी है।
कभी लड़ता है, कभी डरता है, 
सम क्या है, वो क्या जाने।

ख़्वाबों का गुलाबी दर्पण देखकर,
वो अपनी शराबी निगाहें टेक कर।
उस नाज़नीन को देखने के ढूंढता है बहाने,
लहज़ा क्या है, क्या जाने! 

कभी तो ऐनक लगाकर,
वो हाथ से हाथ मिलाकर।
चला है सरकार सजाने,
तज़ुर्बा क्या है, क्या जाने।

कभी बरसती है मीठी बर्फ़,
वो लिखता है यारी दोस्ती के हर्फ़।
चला है पराये को आजमाने,
अपना कौन है, क्या जाने।

सोचता है, खोजता है, हकलाता है,
अपनी हालातों को झुठलाता है।
अश्कों से सना हुआ है तकिया, 
ये ख़्वाब क्या हैं, बस वो जाने...