पर दिल तो वामपंथी है।
ना जाने फ़िर कहाँ से आई,
ऐसी कट्टरपंती है?
वो कट्टरपंती जो कभी किसी को,
छोटा बड़ा ना तोलती हो।
वो कट्टरपंती जो सभी मसलों को,
एक नाप में तोलती हो।
वो कट्टरपंती जो संविधान को,
पूजती और सरहाती है,
निरपेक्षता के विवाद पे उसकी,
गाड़ी फ़िर थम जाती है।
दिल दहलता है ऊंच नीच की राहों से,
धर्मों को ढाल बनाने से।
कवि की हैसियत से कहता हूँ,
डर लगता है फ़िर ज़माने से।
फिर पन्ने पलटे कानूनी,
जानने थे कुछ राज़ ज़रूरी।
एक नज़र में जान गए,
उस बे-दिल को पहचान गए।
कवि थे, रो दिए,
दो घड़ी राजनीति को छोड़ दिए।
कवि थे ना! नादान थे,
इसकी क़लम से अनजान थे।
वो कलम जिसने कल लिखा,
कल को परसों बनाती है,
हाँ, हाँ ये मोटी किताब,
मेरा देश चलाती है।
चले आए कविकरन,
देश बदलने, बनाने।
दिल की धड़कन और उल्फ़त में,
बन गए रोज़ फसाने।
भुकमरी ओर गरीबी से,
धनवानों की जागीरों से,
वो दिल कितना रोता जो जुड़ा है,
लाखों की ताक़दीरों से।
ये संविधान इश्क़ से नही,
मस्तिष्क से बना है।
इसकी स्याही में,
पूरा न्यायालय सना है।
ये बे-दिल है, बे-हिस नही,
हम ख़फ़ा ज़रूर हों, बेबस नहीं।
शुक्र है सिर्फ दिमाग है इसका,
दिल पे तो किसी का बस नही।