मेरे कई दोस्त हैं,
कुछ टेढ़े, कुछ मेढ़े।
कुछ तीखे, कुछ सूखे।
कोई आगे, कोई पीछे।
कोई ऊपर, कोई नीचे।
ऐसे मेरे दोस्त नहीं,
जो किसी एक लव्ज़ के लायक़ हों।
चाहे वो साजन हो,
या के खलनायक हो।
ऐसी उनकी छवि नहीं,
जो एक ही भाव की रहबर हो,
कोई दोस्त हो कोमल सा,
कोई वीरता का चिह्न हो।
लगते मुझे सभी हैं प्यारे,
राज-दुलारे, अटूट सहारे।
अलग-अलग हैं धर्म सभी के,
अलग-अलग मज़हब हैं।
अलग-अलग भगवान हैं सबके,
हम तो भैय्या "सेकूलर" हैं!
कुछ नौटंकी बच्चे हैं,
कुछ हँसते-गाते हैं।
कुछ अपनी धुन में खोकर,
नयी धुन बनाते हैं।
मेरे दोस्त ज़्यादा नहीं,
बस सात ही हैं।
मामा-पापा तो हैं ही,
ख़ुशी और ग़म को भी दोस्त बना लिया है।
जब सबका साथ हो, और मित्रता की बात हो,
तो क्यों ना बने सारे के सारे दोस्त!
गर सुर और सरगम साथ हो,
तो संगीत ही हुआ वास्तव में मेरा दोस्त!