Saturday, 18 January 2020

मेरे दोस्त

मेरे कई दोस्त हैं,
कुछ टेढ़े, कुछ मेढ़े।
कुछ तीखे, कुछ सूखे।
कोई आगे, कोई पीछे।
कोई ऊपर, कोई नीचे।

ऐसे मेरे दोस्त नहीं,
जो किसी एक लव्ज़ के लायक़ हों।
चाहे वो साजन हो,
या के खलनायक हो।

ऐसी उनकी छवि नहीं,
जो एक ही भाव की रहबर हो,
कोई दोस्त हो कोमल सा,
कोई वीरता का चिह्न हो।

लगते मुझे सभी हैं प्यारे,
राज-दुलारे, अटूट सहारे।

अलग-अलग हैं धर्म सभी के,
अलग-अलग मज़हब हैं।
अलग-अलग भगवान हैं सबके,
हम तो भैय्या "सेकूलर" हैं!

कुछ नौटंकी बच्चे हैं,
कुछ हँसते-गाते हैं।
कुछ अपनी धुन में खोकर,
नयी धुन बनाते हैं।

मेरे दोस्त ज़्यादा नहीं,
बस सात ही हैं।
मामा-पापा तो हैं ही,
ख़ुशी और ग़म को भी दोस्त बना लिया है।

जब सबका साथ हो, और मित्रता की बात हो,
तो क्यों ना बने सारे के सारे दोस्त!
गर सुर और सरगम साथ हो,
तो संगीत ही हुआ वास्तव में मेरा दोस्त!


















Thursday, 9 January 2020

मेरी नज़्में

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,
के ये नग़मा तो आपने सुना ही होगा।
पर मन में एक सवाल भी आता है,
क्या आपने मेरी नज़्मों को कभी ग़ौर से पढ़ा होगा?

कुछ हँसते गाते अल्फ़ाज़ हैं, धूप-ओ-नूर है,
कहीं ग़म का काला रूप है,
लिखता है मेरा कलम जो चाहे,
इसमे मेरा क्या क़सूर है?

हाँ, कभी हो जाता हूँ मैं निबंधि,
कर लेता हूँ कुछ एक शर्मसार तुकबंदी।
पता सबको होता है,
ख़ता अनजाने नही होती है।

कई बार मेरी नज़्में पढ़कर लोग ज़रा नाराज़ हो जाते हैं।
पढ़ते तो हँसी-खुशी हैं,
कुछ देर बाद मिज़ाज से नासाज़ हो जाते हैं।

हाँ, ग़म-ए-हस्ती भी आते हैं,
मौजों की तराह फिर जाते हैं।
मेरी स्याही तो उन थोड़े से अश्कों की रहबर है,
जो पलकों से काग़ज़ पर यूँ ही छलक जाते हैं।

ग़मो की बात हो, तो इश्क़ कैसे पीछे हट जाए,
एक हम हैं, जिनकी पतंग उड़ते ही कट जाए।
"कविकरन" डर मोहब्बत से, कहीं फ़िर गुमान ना होजाये,
दर्द-ए-मोहब्बत के चलते, तेरी नज़्मों से तेरे टूटे दिल की तख़्ती,
और नुमाया ना हो जाए।

पर क्या मेरे अंधे दर्शक हैं?
जो एक शब्द पर नगमस्तक हैं?
क्या उन्हें ये इल्म है,
के ये कविता किसका चिह्न है?

मेरी सबसे एक ही दरख़्वास्त है,
सराहो वही जो आपको लगता ख़ास है,
मेरा क्या, मैं एक तरफ़ा आशिक़, मेरे दो लव्ज़ ही सच हैं,
बाक़ी सब बकवास है।




Monday, 6 January 2020

ये क्या हो रहा है?


रफ़्ता-रफ़्ता जली है लौ,
नुमाइश की अंज़ूमन में।
आनन-फ़ानन ये क्या हो रहा है,
सियासत की चिलमन में।

ग़म इसका नहीं कि कुछ हो रहा है,
कुछ होता तो कुछ और भी होना लाज़मी था,
होते होते यूँ पहुँचा है अंजाम,
आज आह--तड़प निकलती है, तमाम बदन से।

गिला है के मौजूदा शाह-सवार अब तक ख़ामोश हैं,
गिला है के मुल्क में छाई बेचैनी और बेबसी की आग़ोश है।
गिला है के आज सभी अपनी मालूमात, ख़यालात में बेहोश हैं,
के आक्रोश है आज ज़हन--आवाम में।

कल तक जो यहीं के थे,
आज वो क़ौमी बन गए हैं।
शायरों के आशारों में भी,
मज़हबी पन्ने जुड़ गए हैं।
क्या इतनी मग़रूर है मेरी क़लम निगाह--सियासत में?

ना मैं इस दल का हूँ, 
ना उस पंथ का।
ना मैं इस ख़याल का हूँ,
ना उस विचार का।
फिरदौस धूँदता था कभी, अब शाँती चाहता हूँ मैं अहल--वतन से।