Thursday, 19 July 2018

ख़ुशी क्या है?

ख़ुशी क्या है?
एक शीशे का मकान है।
पल भर की रौशनी है,
फिर ग़म का अकाल है।

हसीन हसरतों की बेबुनियाद दुनिया,
क्या जन्नत सी लगती है!
कभी कभी तो यूं लगता है कि लाखों कलियां,
दिल के बागों में खिलाती हैं।

कब तक रहेगी ये ख़ुशी?
कितनी होगी इसकी बरक़त?
या फिर कटेगी बेज़ार सी ज़िन्दगि,
और आएगी क़यामत।

ख़ुशी क्या है?
अजीब सवाल है,
जो ढूंढने चला था उसे,
उसका हाल बेहाल है।

यह जो खेल है दुनिया,
जिसके हैं हम नाज़रीन।
सिमटी हुई हैं उसमें कुछ घड़ियाँ,
जो हैं नरगिसी, जो हैं आफ़रीन।

इन्ही छोटी घड़ियों में,
वक्त का बसेरा हो जाए।
काश इस काँच के मकान को,
थोड़ी रौशनी, थोड़ी चांदनी मिल जाय।

Friday, 6 July 2018

आनन् फ़ानन ज़िन्दगि

आजकल जिंदगीं का यह आलम है,
तलातुम है, आनन् फ़ानन है।

जीने की तमन्ना लिए,
कुछ सपने लिए, अरमान लिए, (गुज़रे और आने वाले कल की राहों पर,)
एक रोज़ वो सैर करता हैं,
शामों सहेर करता हैं।

कहीं दर्द का साया है,
कहीं खुशियों की माया है
ज़िन्दगि की रफ़्तार ने,
इंसान को बखूबी भगाया है।

कुछ होश नहीं,
जीना दुश्वार है
इंसान की बेबस तन्हाई का,
सबब ही ये कम्बख्त रफ़्तार है।

जानता नहीं आस पड़ोस,
पैसों में ढूंढता है फिरदौस।
इसी पैसे से वो दिल को बहलाता है,
हफ्ते भर पिस कर, मौज उड़ाता है।

(मगर) अकेला खो गया है, भरी-भरी है महफ़िल,
अकेला अश्क बहाता है, क्या करेगा हासिल?
दूर कहीं है उसका घर, पास है जन्नत की मंज़िल।

भूले बिसरे शिकवों की तलवार दिल पर लिए,
जलते हैं उसकी आँखों में, टूटे सपनों के दिए,
याद करता है वो तोड़े हुए वादे, जो कभी खुद से थे किये।

क्या रिश्ते, क्या नाते, एक दिन सब छूट जाता है।
खुद से इस ज़िन्दगि की रफ़्तार में लड़ते लड़ते,
इंसान पूरी तरह टूट जाता है।

दर्द होता है, होता है अफ़सोस,
ऐसे किस्से सुनने में आते हैं हर रोज़।
क्या किया जाए, उसको चैन कहाँ है,
इंसान जो जीते जी यहाँ मर रहा है,
तो ज़िंदा कहाँ है?