Friday, 30 September 2016

ख़ामोशी

एक रोज़ मैं ख़ामोशी से बात करता हूँ,
और वोह है, की कुछ अनसुना  कह जाती  है।

अपनी आवाज़ तले एक पैग़ाम देती है,
आजकल की भाग दौड़ का अंदाजा होगा उसे,
इसलिए काम ही दस्तक देती है।

ख़ामोशी की अपनी आवाज़ सुनने को मैं बेताब हूँ,
उसकी बातों से हैरान हूँ,
उससे मैंने कहा, "एक झलक तो दिखाओ, नहीं तो हम तरस जायेंगे",
उनसे कहा. "एक दिन मैं बोलूंगी, और तुम  चुप हो जाओगे!

Sunday, 5 June 2016

A Thousand Stars

There are a thousand stars, to gaze upon,
Paving way for a cheerful morn.
Some appear in groups of Ursa Major,
Some in Orion.

Some of them, though only in fiction,
Are the stars which fulfil our ambition.
These are the wishing stars,
Some people believe them to be superstition.

There are a thousand stars, infinite galaxies,
But how do I reach them?
People reach them in both curiosity and misery,
The curious is the astronaut, the sad are the dead.

There are a thousand stars,
One of them must of some one of my family.
Freed from life's strenous bars,
In a complete, peaceful reverie...

Monday, 14 March 2016

इन्तेहाँ

हुआ सवेरा, नए दिन की शुरुआत, आज होना था विज्ञान का इन्तेहाँ,
निकले सब बच्चे सरपट, संकट के लिए तैयार।

कहीं कोई बोला 'जय बजरंग बलि', कहीं कोई बिलखता बोला 'हे राम!',
कहियों को याद आये जीज़स, किसी ने कहा, 'या अल्लाह!'

बजी घंटी चुनौती की, सूख गया सभी का लहू,
अब उन्हें बस बचा सकते थे आर्कमिडीज प्रभु।

खोला प्रश्न-पत्र तो देखा,
वही मन्हूस अंक-रेखा।
कहीं एक अंक के खतरनाक सवाल और कहीं पांच-पांच तड़का।

रखी सभने हिम्मत, पढ़ा प्रश्न-पत्र ध्यान से,
बिना आवाज़ के, मनो एकांत में।
तभ जाकर उन्हें समझ में आया,
यह सभ तो अध्यापिका ने, पहले ही था पढ़ाया!
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इन्हीं बच्चों की तरह, रहो सावधान,
एक बार नहीं, पढ़ो प्रश्न-पत्र बार-बार,
हल हो जाएंगे, तुम्हारे सभी कठिन सवाल।

All the best for exams, everyone!
-Karan Dhall

Saturday, 13 February 2016

ज़िन्दगी का सफर

ज़िन्दगी का खेल देख, ऐ बन्दे,
क्या करूँ, सूझता नहीं।
कब सवेरा आया, कब शाम ढली, ऐ बन्दे,
ज़िंदगानी यूं ही गुज़र गई।

कुछ पाया, कुछ खोया, इस बंजारे ने,
बाज़ी हारी तो कभी इसने जीत ली।
पता था उसको, उसका मुकद्दर,
अपनी किस्मत तो इसने, खुद ही थी लिखी।

मैं फिरता रहा, फिराक़ में,
ज़िन्दगी से नाता टूटा,
अपनी ज़िंदगानी से तलाक़ देते,
मौत की सूली चढ़ गया।

Friday, 12 February 2016

वक़्त

 ऐ खुदा! जब तुझसे माँगा था इक पल,
 तूने ना दिया।
 वो बचपन के झूलों को पल-दो-पल,
 झूलने ना दिया।


 गली-गली से, पेड़-बेल से वाकिफ़,  था मैं, ऐ खुदा!
 तूने मुझे उनको अपना पैग़ाम देने ना दिया।


 अब  जो मैं, बैठा ख़फ़ा था, तू मुझे मिला,
 कहा तूने वक़्त के दायरे में जो मैं खोजता था, उसे तो वक़्त ने ही था....छीन लिया।

कब मैंने जाना था, वक़्त, यूं ही कट जाएगा, वक्त ऐसे निकल गया,
हाथ की लकीरों पर, बचपन का आँचल छोड़ गया....