ऐ खुदा! जब तुझसे माँगा था इक पल,
तूने ना दिया।
वो बचपन के झूलों को पल-दो-पल,
झूलने ना दिया।
गली-गली से, पेड़-बेल से वाकिफ़, था मैं, ऐ खुदा!
तूने मुझे उनको अपना पैग़ाम देने ना दिया।
अब जो मैं, बैठा ख़फ़ा था, तू मुझे मिला,
कहा तूने वक़्त के दायरे में जो मैं खोजता था, उसे तो वक़्त ने ही था....छीन लिया।
कब मैंने जाना था, वक़्त, यूं ही कट जाएगा, वक्त ऐसे निकल गया,
हाथ की लकीरों पर, बचपन का आँचल छोड़ गया....
तूने ना दिया।
वो बचपन के झूलों को पल-दो-पल,
झूलने ना दिया।
गली-गली से, पेड़-बेल से वाकिफ़, था मैं, ऐ खुदा!
तूने मुझे उनको अपना पैग़ाम देने ना दिया।
अब जो मैं, बैठा ख़फ़ा था, तू मुझे मिला,
कहा तूने वक़्त के दायरे में जो मैं खोजता था, उसे तो वक़्त ने ही था....छीन लिया।
कब मैंने जाना था, वक़्त, यूं ही कट जाएगा, वक्त ऐसे निकल गया,
हाथ की लकीरों पर, बचपन का आँचल छोड़ गया....
क्या बात
ReplyDeleteToo good Karan
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