Wednesday, 18 November 2020

दीद-ए-दिल से यार के मुझको भला पाना क्या है?

दीद-ए-दिल से यार के मुझको भला पाना क्या है?
हर्फ़-तहरिरों के फ़न से मुझको दिखलाना क्या है?

हो कसक स्याही में पुख़्ता, हो तड़प दिल-ए-यतीम,
आबाद तुझको करके दुनिया को बसाना क्या है?

आ सका हो कोई साक़ी दर पे तेरे ऐ सनम,
गर पाया हो पा ख़ुल्द में तो फिर साक़ी को झुटलाना क्या है।

हम जानते हैं तेरे जलवों की हक़ीक़त, मगर ऐ महजबीं,
हो रही हैं बे-नूर रातें कुछ दिनों से, बता इरादा क्या है?

है ले रही ताउम्र तेरी वस्ल की वो एक दफ़ा,
जो इंतेक़ाम-ए-वक़्त में ना हो फ़ना वो दीवाना क्या है?

जो लिया तेरी मोहब्बत का जोग, मैं बे-इख़्तियार,
अब होश संभालूँगा तो पूछूँगा, बेख़ुदी क्या है?

बेख़ुदी में बे-हिसि सी आ रही है आजकल,
आया जो गली-ए-रक़ीब, पूछा तेरा पता क्या है?

जा जनेमन, बांधे कफ़न, मैं जा रहा हूँ लौट के,
तेरा पता तो मिल गया, मेरा बता क्या है?

हो मुबारक एक सफ़ीना ऐ हसीना, ग़ैर का,
काग़ज़ी कश्ती मेरी साहिल को ताकती क्या है?










Monday, 2 November 2020

वो शहर

बेसब्र आँखें, ये बेक़ब्र जिस्म,
ये आह-ओ-फुगाँ भरते मुफ़लिस,
मंज़र लेते खर्राटे हैं,
अब चारों ओर सन्नाटे हैं।

ता-निगाह तेज़ाब फ़ैला है हुआ एक कहर का,
ख़ून के पैराब से रस्ता मिला है सहर का,
एक नए शहर का...

ये शहर बड़ा अंजान है,
नाम है, पर बदनाम है,
गुमनाम है।

ये शहर जो कभी बस्ता था,
जहाँ बच्चा-बच्चा हँसता था,
आज खामोश है,
खानाबदोश है।

गुलज़ार तो है, गुलफ़ाम नहीं,
बंजर ना हो, कोई बाग़ नहीं।
हाँ खेत झुलसते थे पहले,
पर उनमें अब वो बात नहीं।

अब ना किसी का पहरा होगा,
ये सराय भी सेहरा होगा।
जलता है दिन जलता होगा,
ढ़लता है दिन ढ़लता होगा,
अंधियारा घनेहरा होगा।