बल्लू चढ़ गया रेल में,
दिल्ली के दैनिक खेल में।
एक चाह उमड़ आयी,
एक कुर्सी नज़र आयी।
बड़ी अजब कुर्सी थी, भैय्या, एक अकेली भीड़ में!
देखा-देखि होने से पहले, आ गयी दादी की नसीब में।
बल्लू भैया बड़ा पछताए,
बगल वाले चचा ने समोसे थे खाये।
बर्दाश्त की हद हो चुकी थी,
रेल राजीव चौक पहुच चुकी थी।
गुज़रा नही था एक मिनट की गाड़ी रुकी थी,
पर यात्रियों को घर जाने की जल्दी बड़ी थी।
बल्लू को दबोच गया, एक पहलवान,
चढ़े जा रहा था इंसान पे इंसान।
बल्लू को याद आई, सहूलियत की घड़ियाँ,
कहाँ ये डिब्बा, कहाँ घर की गाड़ियाँ।
पहली सवारी में, बल्लू को खटक गयी रेल,
गया राजीव, आया पटेल।
इतने वक्त बाद मिला ना कोई दयावान,
एम्स पर उतर जाता, ऐसा बुरा था उसका हाल।
वो डटा रहा, के घर पास है,
अगला स्टेशन हौज़ खास है!
रेलगाड़ी भी कुछ व्यस्त थी,
कहीं सुस्त, कहीं अपनी रफ्तार में मस्त थी।
चलती रुकती गाड़ी में, आखिर उसके एक तख्त मिला,
लेकिन उसको आराम का, कुछ दो स्टेशन ही वक्त मिला।
जैसे ही नींद के झोंके बल्लू को,
अपने वश में लाते।
उसके सामने बूढ़ों और महिलाओं के मंज़र आते।
बाला टली किसी तरह वो इफको चौक तक पहुचा,
उतर गयीं दादी, उतर गए चचा।
कुर्सियाँ थी इतनी की बल्लू मचल उठा था,
पर रेलगाड़ी का पहिया आखरी स्टेशन को चल पड़ा था।
बल्लू को गीता के शब्द उस दिन समझ में आये,
सब कुछ मोह माया है, जो आये और जाए।
तो यह थी बल्लू की पहली सवारी,
चढ़ जाईये रेल में,
अब आपकी है बारी।
Amazing! You sure have a way with words!
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