Monday, 15 July 2019

गरज-बरस, गरज-बरस

गरज बरस, गरज बरस, 
प्यासी धरती झर-झर झर-झर,
मल्हार को पुकारे।

नाचता है मोर, 
लाये संग भादो की भोर,
काले अम्बर के तले,
करे रिमझिम इशारे। 

पवन के झोंके ठन्डे ठन्डे,
नुक्कड़ पर बिकते चाट पकोड़े,
जून-जुलाई के,
यही तो हैं गज़ब नज़ारे। 

क्या बूढ़े, क्या जवान?
गर्मी से बेहाल थे सारे।
टिप-टिप बरसती बूंदों में,
कागज़ की कश्तियों के सहारे,
ढूँढ़ते हैं सुकून के किनारे। 

पंछी भी चेहचाते हैं,
अजब राग गाते हैं। 
बरसात के मौसम में बदमस्त ,
वो बन गए हैं मतवाले।

प्यासी धरती प्यासी नहीं,
धुल गए हैं उसके किनारे।
हाँ ये सब हैं उसी,
अलबेले सावन के ईशारे। 
 


 

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