Friday, 19 July 2019

शेर-ओ-शायरी...और ग़ालिब

तबियत के तो रंगीन थे, ग़ालिब,
खुदा ने शायर बना डाला।
लफ़्ज़ों की कश्ती जाएगी किस जानिब?
खुदी ने जज़्बात का सैलाब बना डाला।

वो जो लिखते हैं छुप छुप के गुप्त चिट्ठियों में,
वो अल्फ़ाज़ भी दबे कुचले घुटते हैं।
एक हम शायर हैं जो, ऐतबार में,
उस स्याही को आवामी देते हैं

ज़िन्दगी भी रंगीन है हमारी,
हसीन हसरतों का एक मकान है।
ऐ ग़ालिब, तुझसे सुबह उगती है हमारी,
आज़मी, तुम से ढलती शाम है।

कोई गर दिल लगाए, तो तोड़ेंगे नहीं,
मगर दिल लगाये कौन?
एक शायर आशिक़ की लौ,
बुझाये कौन?

मोजज़ा-ए-मोहब्बत के किस्से छोड़िये,
किसी दिन फुरसत में करेंगे।
ये ग़ज़ल-शायरी का शौक उतरे,
तो तसल्ली से कुछ पढ़ लिख लेंगे।

शौक महँगा है,
पर है मज़ेदार।
मेरी किताब बन गयी है,
उर्दू सीखने का इश्तहार।

मैं अकेला नहीं चल रहा हूँ,
इस राह पर।
और कितने हैं मेरे जैसे, ग़ालिब,
जो फिदा हैं तेरी शायरी पर।

Monday, 15 July 2019

गरज-बरस, गरज-बरस

गरज बरस, गरज बरस, 
प्यासी धरती झर-झर झर-झर,
मल्हार को पुकारे।

नाचता है मोर, 
लाये संग भादो की भोर,
काले अम्बर के तले,
करे रिमझिम इशारे। 

पवन के झोंके ठन्डे ठन्डे,
नुक्कड़ पर बिकते चाट पकोड़े,
जून-जुलाई के,
यही तो हैं गज़ब नज़ारे। 

क्या बूढ़े, क्या जवान?
गर्मी से बेहाल थे सारे।
टिप-टिप बरसती बूंदों में,
कागज़ की कश्तियों के सहारे,
ढूँढ़ते हैं सुकून के किनारे। 

पंछी भी चेहचाते हैं,
अजब राग गाते हैं। 
बरसात के मौसम में बदमस्त ,
वो बन गए हैं मतवाले।

प्यासी धरती प्यासी नहीं,
धुल गए हैं उसके किनारे।
हाँ ये सब हैं उसी,
अलबेले सावन के ईशारे।