Friday, 12 April 2019

सूखा

सवेरे-सवेरे आँख खुली तो आसमान भी नम था,

तारे अपना आखरी सलाम करते चले,

और सूरज की लौ से सारा आँगन जल रहा था।  


गौर फ़रमाया तो देखा, बेबस बंजर ज़मीन, ज़ार-ज़ार रो रही थी,

कल जो फसल उगाई थी, मौत की नींद सो रही थी। 


उस बंजर ज़मीन का मंज़र, जैसे कोई सराब था,

जिसके बीचो-बीच एक जज़ीरे में, महक रहा था बीते कल की सुनहरी फसल का ज़ायका,

जिसके दामन में हकीकत का एक भी कतरा नहीं, एक भी सुराख नहीं था।


गम में आकर, मासूम नैनों से, चार अश्क बह गए, 

आनन्-फानन, यक-बयक, सारे सपनें बिखर गए। 


उदास हूँ, यह सोचकर,

किसका कर्ज़दार हूँ?

मैंने तो शामो-सेहर। 

शिद्दत से बोया था ज्वार-गेहूं। 


बचे-कूचे पैसों में, जीना दुश्वार है,

एक तरफ वो जमींदार, तो दूजी ओर मौत तैयार है।


उदास हूँ, यह सोचकर,

किसका कर्ज़दार हूँ?

कर्ज़े पर जी रहा हूँ,

कर्ज़ों से बेज़ार हूँ। 


दो कदम पर बुतखाना,

चार पग है मैकदा। 

किसका रास्ता है मुनासिब?

मेरे मालिक, तू बता।  


खरीद लाता कोई मौत को, तो अच्छा होता,

कम्बख्त ये कर्ज़ों का सिलसिला तो ख़त्म होता।

ऐ काश! मैं अपने बच्चों के मन में सुनहरे सपने ना बोता।


इस साल फिर पड़ा है सूखा, 

और कुछ मासूम ख्वाबों-ख्यालों की निराई की गई है। 

2 comments:

  1. "खरीद लाता कोई मौत को"
    such beautiful words
    very inspiring

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