Saturday, 13 February 2016

ज़िन्दगी का सफर

ज़िन्दगी का खेल देख, ऐ बन्दे,
क्या करूँ, सूझता नहीं।
कब सवेरा आया, कब शाम ढली, ऐ बन्दे,
ज़िंदगानी यूं ही गुज़र गई।

कुछ पाया, कुछ खोया, इस बंजारे ने,
बाज़ी हारी तो कभी इसने जीत ली।
पता था उसको, उसका मुकद्दर,
अपनी किस्मत तो इसने, खुद ही थी लिखी।

मैं फिरता रहा, फिराक़ में,
ज़िन्दगी से नाता टूटा,
अपनी ज़िंदगानी से तलाक़ देते,
मौत की सूली चढ़ गया।

Friday, 12 February 2016

वक़्त

 ऐ खुदा! जब तुझसे माँगा था इक पल,
 तूने ना दिया।
 वो बचपन के झूलों को पल-दो-पल,
 झूलने ना दिया।


 गली-गली से, पेड़-बेल से वाकिफ़,  था मैं, ऐ खुदा!
 तूने मुझे उनको अपना पैग़ाम देने ना दिया।


 अब  जो मैं, बैठा ख़फ़ा था, तू मुझे मिला,
 कहा तूने वक़्त के दायरे में जो मैं खोजता था, उसे तो वक़्त ने ही था....छीन लिया।

कब मैंने जाना था, वक़्त, यूं ही कट जाएगा, वक्त ऐसे निकल गया,
हाथ की लकीरों पर, बचपन का आँचल छोड़ गया....