ज़िन्दगी का खेल देख, ऐ बन्दे,
क्या करूँ, सूझता नहीं।
कब सवेरा आया, कब शाम ढली, ऐ बन्दे,
ज़िंदगानी यूं ही गुज़र गई।
कुछ पाया, कुछ खोया, इस बंजारे ने,
बाज़ी हारी तो कभी इसने जीत ली।
पता था उसको, उसका मुकद्दर,
अपनी किस्मत तो इसने, खुद ही थी लिखी।
मैं फिरता रहा, फिराक़ में,
ज़िन्दगी से नाता टूटा,
अपनी ज़िंदगानी से तलाक़ देते,
मौत की सूली चढ़ गया।
क्या करूँ, सूझता नहीं।
कब सवेरा आया, कब शाम ढली, ऐ बन्दे,
ज़िंदगानी यूं ही गुज़र गई।
कुछ पाया, कुछ खोया, इस बंजारे ने,
बाज़ी हारी तो कभी इसने जीत ली।
पता था उसको, उसका मुकद्दर,
अपनी किस्मत तो इसने, खुद ही थी लिखी।
मैं फिरता रहा, फिराक़ में,
ज़िन्दगी से नाता टूटा,
अपनी ज़िंदगानी से तलाक़ देते,
मौत की सूली चढ़ गया।