Wednesday, 30 December 2020

ख़ामोशी

कहीं दूर मिलूँगा फिर तुमको,
वो जज़ीरा जहाँ मैं हूँ,
जहाँ तुम हो,
और ख़ामोशी हो।

कहीं दूर मिलूँगा फ़िर तुमको,
वो जज़ीरा जहाँ लव्ज़ हों बुझे-बुझे,
सागर से हारे हुए,
वो सागर जो सब सुन रहा हो, समझ रहा हो,
वो लफ़्ज़ों का सागर ख़ामोश हो, बेहिस हो।

कहीं दूर मिलूँगा तुमको,
जब सब धुल गया हो,
ये चाँदनी, ये नूर,
ये गुल, वो गुलज़ार,
जब सब सिमट चुका हो,
झुलस चुका हो।

उस आग में,
उस दाग में,
ना फ़िराक़ में,
ना फ़रियाद में,
बस एक याद में,
फ़िर मिलूँगा तुमको,
कहीं दूर फ़िर मिलूँगा तुमको।

एक रोज़ जब कभी कट रही होंगी उफ़ूक़ की नज़र,
टूटने लगा हो जो खामोशी का असर,
शायद यही होगा फुरक़त का असर,
उस जज़ीरे से जहाँ पर मैं था,
तुम थी,
ख़ामोशी थी कभी।

अब लव्ज़ हैं तो शोर है,
कुछ इस ओर कुछ उस छोर है,
बेताबी झुलस रही है इधर भी, उधर भी,
बेख़याली सिसक रही है इधर भी, उधर भी।

ये सागर जो पुकार रहा है,
उस पाक जज़ीरे को ललकार रहा है,
इसकी लहरों में ना आना,
मुझे कहीं भूल ना जाना।

भूल गई तो याद दिलाता हूँ,
मैं फ़िर बीती बात सुनाता हूँ,
जब कुछ कहने को नही था,
जब कुछ सुनने को नही था।

उस जज़ीरे पर,
जहाँ मैं था
जहाँ तुम थी,
और ख़ामोशी थी।