Saturday, 14 December 2019

ऐ रक़ीब

हमें यूँ ज़लील ना कर ऐ रक़ीब,
कभी हम भी मोहब्बत किया करते थे।
जिसे देख तुम जीते हो,
कभी उसी पर हम मरते थे।

मदहोश हो अभी रक़्स-ए-मोहब्बत के मज़े में,
यूँ इतराओ ना,
कभी हम भी घुंगरू बाँधा करते थे।

तुम चाँद आधा करते हो, शब-ए-वस्ल की आड़ में,
वस्ल की घड़ियों के इंतेज़ार में, नींद से रूठकर,
कभी हम रात आधी किया करते थे।

लबों पे तबस्सुम लिए जो तुम ग़ज़लें गया करते हो,
हम उन्ही के शायर हैं,
मुकर्रर किया करते थे।

ऐ रक़ीब, तुझसे क्या गिला करूँ?
मोहब्बत में क्या मिला क्या कहूँ?
यही कहूँगा हाथ तो मिला ले,
कभी हम दोस्त हुआ करते थे।