Sunday, 25 November 2018

मैं आईना हूँ

मैं आईना हूँ,
इस सितमगर वक्त से मेरा बरसों का याराना है।
यह काँच मेरा, एक सदी का सफर है
एक उम्र का फसाना है।

तुम जब रूबरू आई बचपन में,
ज़ुल्फ़ सवारते देखा है तुम्हे।
वो सजने सवरने की आड़ में,
अरसों तक निहारा है तुम्हे।

तुम कभी कभी जो खफा,
जो मुझसे हो जाति थी।
अपने मेहबूब की आंखों को,
मेरे जैसा बताती।

शायद तस्सली ना दे पाया तुम्हे,
तुम्हारे मन मे था जवान उमंगों का रक्स।
अफसोस, तुमको ना दिखा सका मैं,
एक हूर-पारी सा अक्स।

ले ली तुमने जब रंग रूप से रुखसत,
तुम्हारे चंचल नैनों को कहाँ थी फुरसत।
उम्र की रफ़्तार को थमा ना सका,
मैं तुम्हारे चेहरे की झुर्रियाँ छुपा ना सका।

रोज़ मेरे इस शीशे से,
एक और ज़िन्दगि जुड़ जाती है।
कभी रूठ जाते हैं लोग मुझसे,
कभी मेरा दीदार करके उनको तस्सली मिल जाती है।

मैं आईना हूँ,
किसीका ख्वाब नही।
कितना कुछ कह जाती हैं मेरी आँखें,
सदियों से हैं जो बेज़ुबान रहीं।