दो मुल्कों में छाया,
यह कैसा सन्नाटा है?
लगता है मामला-ए-जंग,
फिर सामने आया है।
गली गली खून बहे,
जन्नत की फ़िराक में।
जवान मारे जा रहे हैं,
रात ही रात में।
दुश्मनी और जंग के बीजों से बोई हुई ज़मीन,
अब काफी उपजाऊ है।
यलगार के मझधारे में,
डामाडोल मुल्कों की नाव है।
इन्सानियत ने रुख मोड़ लिया है,
जाहिलों से रिश्ता जोड़ लिया है।
एक मुल्क ने दुसरे का,
आपसी भरोसा तोड़ दिया है।
(ऐ काश अमन का चमन,
आ जाए ज़मीन पर,
गर यहाँ जन्नत होती,
तो नज़ारा और होता)