Saturday, 4 November 2017

एक नज़्म का सफ़र

जब कोई ख्वाब,
एक रोज़ रात को आता है।
पकड़कर कलम-किताब,
कुछ लिखने को जी ललचाता है।

होते हैं ख़याल, होता है दस्तूर,
मगर अल्फाज़ कर देते हैं मजबूर।

कैसे एक एहसास को,
लव्ज़ों में बयाँ किया जाए।
किस तरह इस उलझन को,
शायराना अंदाज़ में सुलझाया जाए।

मन का दामन छोड कर लव्ज़,
कहाँ आसानी से आते है?
यह तो इस दिल तक का सफ़र,
तय करके आते हैं।

खूब सलाह-मश्वरा कर,
जब कई ख़याल भर आते हैं।
रात की प्यारी लोरियाँ सुन कर,
हम नींद में फिर गुमशुदा हो जाते हैं।