ज़िन्दगी किस तरफ है तेरा काफ़िला?
कहाँ है तेरी मंज़िल बता।
मुश्किलों से जूझता मैं,
दरबदर हूँ भटकता।
सपने जो किसी रोज़ रेशमी होते थे,
अब बन गए हैं काँच के,
आशा की आग के जलवे।
अब हो गए हैं राख के।
काँच के ख़्वाब, टूट कर ज़माने की दलदल में धस गए हैं,
जीवन की किस राह पर आकर, हम फस गए हैं।
अगर सुनता है, ऊपरवाले, यह बता तेरी रज़ा क्या है?
अगर यह ज़िन्दगी तेरी दुआ है, तो सज़ा क्या है?