Friday, 20 January 2017

एक फौजी की दास्ताँ...

माँ, मुझे अब सोने दे,
मीठे सपनों में खोने दे।

फिर नाजाने कब सवेरा आएगा,
वतन पर अमन का परचम लहराएगा।

फिर नाजाने कब कोई चुनौती आ जाए,
मुझे प्राणों की आहुति देनी पड़ जाए।

रात की चंद घड़ियाँ, क्यों नापता है, ऐ वक्त?
मैं तो तुझसे मांगूं, चैन की नींद फ़क़त।

फिर फर्ज़ दस्तक देता है,
और देशवासी सो जाते हैं।
फिर सरहद पर मेरे साथी,
डटकर खड़े हो जाते हैं।

फिर जंग में लड़ते लड़ते, जब पल संघर्ष के आते हैं,
एक आग भड़कती है तन में, और शोले उमड़ आते हैं।

क्या बताऊँ माँ,
अंगारे बरसते है सीने में।
वह आग भस्म ना होगी माँ,
जब तक ना आऊं तिरंगे में,
जब तक ना आऊं तिरंगे में।

जय हिंद!